Mata Ahilyabai 301st Jayanti

इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती ने मनाई माता अहल्या बाई की 301वीं जयंती

इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती ने मनाई पुण्यश्लोक माता अहल्या बाई की 301वीं जयंती, नारी सशक्तिकरण और सुशासन को किया नमन “

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती (उत्तर पूर्वी विभाग) द्वारा रविवार को पुण्यश्लोक माता अहल्या बाई होल्कर की 301वीं जयंती के अवसर पर एक भव्य और विचारोत्तेजक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने भारतीय इतिहास में माता अहल्या बाई के अद्वितीय योगदान, उनके सुशासन, और नारी सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनके साहसिक कदमों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

परिषद गीत से हुई शुरुआत, मंचासीन रहे दिग्गज कार्यक्रम का विधिवत आरंभ ‘परिषद गीत’ के गायन के साथ हुआ।

  • अध्यक्षता और संचालन: इस महत्वपूर्ण वैचारिक कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री दिनेश बुलंदशहरी जी ने की, जबकि मंच का कुशल संचालन संस्था के महामंत्री श्री गुलशन लूथरा जी द्वारा किया गया।

  • प्रमुख अतिथियों की उपस्थिति: कार्यक्रम के मंच पर मुख्य रूप से राष्ट्रीय संगठन मंत्री मनोज कुमार जी, राष्ट्रीय संयुक्त महामंत्री डॉ. नीलम राठी जी और प्रांतीय उपाध्यक्ष मनोज शर्मा जी उपस्थित रहे और अपने विचार साझा किए।

साधारण कन्या से महान शासिका बनने का सफर

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने माता अहल्या बाई के जीवन से जुड़े कई प्रेरक और ऐतिहासिक प्रसंगों को श्रोताओं के सामने रखा:

  • शिक्षा और संघर्ष: वक्ताओं ने बताया कि 1725 में एक साधारण परिवार में जन्मीं अहल्या बाई का विवाह महज 8 वर्ष की आयु में खांडेराव जी के साथ हो गया था।

  • उस दौर में जब लड़कियों का पढ़ना लगभग असंभव माना जाता था, तब उनके ससुर मल्हार राव होल्कर ने उन्हें न केवल शिक्षा दिलवाई, बल्कि युद्ध कला में भी निपुण किया।

  • सती प्रथा का त्याग और राजकाज: 30 वर्ष की अल्पायु में पति के वीरगति प्राप्त होने के बाद वह सती होना चाहती थीं, लेकिन उनके ससुर ने उन्हें ऐसा करने से रोका और शासन की बागडोर संभालने की प्रेरणा दी।

  • कूटनीति और सुशासन: उन्होंने बिना हथियार उठाए ही अपनी प्रखर कूटनीतिक बुद्धि से एक आदर्श शासन स्थापित किया।

नारी सशक्तिकरण और लोक कल्याण के कार्य

माता अहल्या बाई केवल एक शासिका नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक भी थीं। उनके शासनकाल की प्रमुख उपलब्धियों को याद करते हुए बताया गया:

  • स्त्री सेना का गठन: अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए उन्होंने अपने राज में महिलाओं की एक विशेष ‘स्त्री सेना’ का गठन किया था।

  • माहेश्वरी साड़ी का उद्गम: उन्होंने रोजगार सृजन के लिए टेक्सटाइल (कपड़ा) के कुटीर उद्योग लगाए, जिन्हें आज पूरी दुनिया में ‘माहेश्वरी साड़ी’ के नाम से जाना जाता है।

  • जल संरक्षण और धर्म रक्षण: पानी के संरक्षण के लिए उन्होंने कई कुएं और बावडियां बनवाईं। इसके साथ ही, देशभर के प्रमुख तीर्थ स्थानों का जीर्णोद्धार भी उनके शासनकाल की एक बड़ी उपलब्धि रही।

कल्याण मंत्र के साथ कार्यक्रम का समापन

इस भव्य जयंती समारोह में साहित्य भारती और समाज के कई प्रबुद्ध वर्ग के लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

प्रमुख रूप से सुनील दत्ता जी, के.के. शर्मा जी, राहुल जी, एन.पी. सिंह राठौर जी, पीयूष जी, सन्तोष जी, संदीप जी, नितिन जी, रवि अरोड़ा जी और प्रवीण जी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के अंत में सभी की शांति और समृद्धि की कामना के साथ ‘कल्याण मंत्र’ का उच्चारण किया गया।

अंत में सुनील दत्ता जी ने कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सभी अतिथियों और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापित किया।

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