भारतीय सेना का डिजिटल शंखनाद: 1 लाख ‘आसमानी योद्धाओं’ की फौज तैयार, ‘भैरव’ बटालियन संभालेगी कमान

“आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप और वैश्विक संघर्षों (रूस-यूक्रेन व इजरायल-हमास) से सीख लेते हुए भारतीय सेना ने अपनी युद्ध रणनीति में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव किया है। सेना ने तकनीक और मैनपावर का एक ऐसा घातक मिश्रण तैयार किया है, जो भविष्य के युद्धों की दिशा बदल देगा”

रक्षा डेस्क | नई दिल्ली, 04 / 01 / 2025 संतोष सेठ की रिपोर्ट 

भारतीय सेना ने अपने बेड़े में 1 लाख से अधिक कुशल ड्रोन ऑपरेटर्स का एक विशाल पूल तैयार कर लिया है, जो दुश्मन की सीमा के भीतर घुसकर सटीक चोट करने में सक्षम हैं।

‘भैरव’ स्पेशल फोर्स: विनाश का नया नाम

इस पूरी रणनीतिक छलांग का केंद्र सेना की नवनिर्मित ‘भैरव’ (Bhairav) स्पेशल फोर्स है। यह यूनिट पारंपरिक बटालियनों से बिल्कुल अलग है। ‘भैरव’ बटालियन को विशेष रूप से ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ के लिए डिजाइन किया गया है।

इस इकाई के कमांडिंग ऑफिसर के अनुसार, “आज चुनौतियां केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि डिजिटल और स्पेस डोमेन में भी हैं। भैरव बटालियन इसी नई सोच का परिणाम है, जहाँ जवान के हाथ में केवल राइफल नहीं, बल्कि अत्याधुनिक ड्रोन का कंट्रोलर भी होगा।”

युद्ध के मैदान में क्या बदलेगा?

इन एक लाख ड्रोन ऑपरेटर्स को वास्तविक युद्ध जैसी कठिन परिस्थितियों में प्रशिक्षित किया गया है। इनकी तैनाती से युद्ध के मैदान में निम्नलिखित क्रांतिकारी बदलाव आएंगे:

  • अदृश्य प्रहार (Stealth Operations): ‘भैरव’ के लड़ाके स्वदेशी कामिकेज़ (आत्मघाती) ड्रोन्स के जरिए दुश्मन के कमांड सेंटर्स और बंकरों को बिना अपनी जान जोखिम में डाले तबाह कर सकेंगे।

  • स्वार्म ड्रोन तकनीक: सेना अब एक साथ सैकड़ों ड्रोन्स के झुंड (Swarm) से हमला करने की क्षमता रखती है, जिससे दुश्मन का रडार और एयर डिफेंस सिस्टम पूरी तरह ठप हो जाएगा।

  • 24/7 आसमानी नजर: एलएसी (LAC) और एलओसी (LoC) जैसे दुर्गम क्षेत्रों में ये ऑपरेटर्स ऊबड़-खाबड़ चोटियों और खराब मौसम के बीच भी दुश्मन की हर हरकत का रीयल-टाइम डेटा मुख्यालय तक पहुँचाएंगे।

हाइब्रिड युद्ध: तकनीक ही अब सबसे बड़ा हथियार

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय सेना का यह कदम ‘जीरो कैजुअल्टी’ (Zero Casualty) वॉरफेयर की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर है। अब जवानों को घने जंगलों या ऊँची पहाड़ियों पर सीधे भेजने से पहले, ड्रोन ऑपरेटर्स इलाके को पूरी तरह सुरक्षित करेंगे और दुश्मन के ठिकानों की पहचान कर उन्हें रिमोट कंट्रोल से ही ध्वस्त कर देंगे।

स्वदेशी ताकत पर जोर

इस मिशन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें इस्तेमाल होने वाले अधिकांश ड्रोन और सॉफ्टवेयर ‘मेक इन इंडिया’ के तहत तैयार किए गए हैं। इसमें एआई (AI) आधारित पहचान प्रणाली लगी है, जो मित्र और शत्रु के बीच अंतर करने में सक्षम है।

सैन्य विशेषज्ञों की राय: ‘तकनीक ही अब नया जनरल है‘

पूर्व सैन्य कमांडरों और रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव भारतीय सेना को ‘मैनपावर इंटेंसिव’ (जवानों पर निर्भर) से ‘टेक्नोलॉजी ओरिएंटेड’ (तकनीक आधारित) सेना में बदल देगा।

“रूस-यूक्रेन युद्ध ने साबित किया है कि एक 500 डॉलर का ड्रोन करोड़ों के टैंक को नष्ट कर सकता है। भारत की ‘भैरव’ फोर्स और 1 लाख ऑपरेटर्स का पूल यह सुनिश्चित करेगा कि भविष्य के युद्ध में हमें अग्रिम मोर्चे पर जवानों की शहादत न देनी पड़े। यह ‘कॉस्ट-इफेक्टिव’ और ‘मैक्सिमम इम्पैक्ट’ वाली रणनीति है।”

एलएसी (LAC) और एलओसी (LoC) पर रणनीतिक प्रभाव

लद्दाख और अरुणाचल (चीन सीमा):

  • ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बढ़त: 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी और भीषण ठंड जवानों की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है। ‘भैरव’ के ड्रोन ऑपरेटर्स इन दुर्गम चोटियों पर ‘वर्चुअल पेट्रोलिंग’ करेंगे।

  • इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी: चीन द्वारा सीमा पार किए जा रहे निर्माण कार्यों की रीयल-टाइम मैपिंग अब चौबीसों घंटे संभव होगी, जिससे ‘सरप्राइज अटैक’ की संभावना शून्य हो जाएगी।

एलओसी (पाकिस्तान सीमा):

  • आतंकवाद विरोधी अभियान: घने जंगलों और गुफाओं में छिपे आतंकियों को खोजने के लिए अब जवानों को सीधे अंदर घुसने की जरूरत नहीं होगी। थर्मल इमेजिंग से लैस ड्रोन्स उनकी सटीक लोकेशन ट्रैक कर ‘पिन-पॉइंट’ स्ट्राइक करेंगे।

  • सुरंग और घुसपैठ का अंत: सीमा पर जमीन के नीचे बनी सुरंगों और घुसपैठ के रास्तों का पता लगाने के लिए ‘ग्राउंड पेनिट्रेटिंग’ ड्रोन्स का उपयोग किया जाएगा।

‘भैरव’ फोर्स की विशेष मारक क्षमता: ‘द साइलेंट किलर’

विशेषज्ञों के अनुसार, भैरव बटालियन के पास कुछ ऐसी क्षमताएं हैं जो इसे वैश्विक स्तर पर अद्वितीय बनाती हैं:

  • AI-पावर्ड टारगेट एक्विजिशन: ये ड्रोन्स खुद निर्णय लेने में सक्षम हैं कि कौन सा लक्ष्य सबसे अधिक खतरनाक है और उसे पहले निशाना बनाना है।

  • इलेक्ट्रॉनिक साइलेंस: भैरव के ऑपरेटर्स ऐसे ड्रोन्स का उपयोग करते हैं जो दुश्मन के जैमर्स की पकड़ में नहीं आते, जिससे वे ‘साइलेंट किलर’ बन जाते हैं।

स्वदेशी स्टार्टअप्स का ‘कवच’

इस मिशन को सफल बनाने में भारत के 100 से अधिक रक्षा स्टार्टअप्स की भूमिका अहम है। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत तैयार ये ड्रोन सौर ऊर्जा से चार्ज होने और प्रतिकूल मौसम में भी उड़ान भरने की क्षमता रखते हैं।


भविष्य की रणनीति: सेना की योजना आने वाले समय में हर इंफेंट्री यूनिट में ड्रोन विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाने की है। ‘भैरव’ फोर्स न केवल आक्रामक अभियानों का नेतृत्व करेगी, बल्कि रसद पहुँचाने (Logistics) और घायलों को मदद देने के लिए भी ड्रोन का इस्तेमाल करेगी।

भारतीय सेना का यह ‘आसमानी दस्ता’ स्पष्ट संदेश दे रहा है— भारत अब केवल रक्षा नहीं करेगा, बल्कि तकनीक के दम पर दुश्मन को उसके घर में ही बेअसर कर देगा।

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