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संपादकीय: बंगाल चुनाव 2026 में क्या ED और CBI तय करेंगे राजनीतिक दिशा? | The Politics Again

संपादकीय (Editorial) : बंगाल का सियासी अखाड़ा— क्या 2026 में भी ED और CBI ही तय करेंगे चुनाव की दिशा ?

संतोष सेठ : न्यूज़ डेस्क  (The Politics Again)

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और इसके साथ ही केंद्रीय जांच एजेंसियों (ED और CBI) के सायरन भी फिर से गूंजने लगे हैं।

चुनाव की तारीखों के ऐलान के तुरंत बाद अवैध कॉल सेंटर मामले में ED की ताबड़तोड़ छापेमारी ने राज्य के सियासी पारे को गरमा दिया है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या बंगाल के चुनाव में शिक्षा, रोजगार और विकास जैसे बुनियादी मुद्दे पीछे छूट जाएंगे और पूरा चुनाव सिर्फ “भ्रष्टाचार बनाम राजनीतिक प्रतिशोध” की धुरी पर लड़ा जाएगा?

बंगाल की राजनीति पिछले एक दशक से इसी नैरेटिव के इर्द-गिर्द घूम रही है। आइए, इस सियासी बिसात के दोनों पहलुओं का निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं:

विपक्ष (BJP) का नैरेटिव: ‘भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस’

भारतीय जनता पार्टी (BJP) और अन्य विपक्षी दलों के लिए ED और CBI की कार्रवाइयां राज्य सरकार को घेरने का सबसे बड़ा और धारदार हथियार हैं।

  • शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला और कोयला तस्करी जैसे मामलों में हुई जेल यात्राओं ने विपक्ष को यह कहने का मौका दिया है कि राज्य में ‘संस्थागत भ्रष्टाचार’ (Institutional Corruption) चरम पर है।

  • चुनाव में विपक्ष का मुख्य एजेंडा यही है कि वह इन छापों और बरामद हुए कैश को जनता के सामने सुशासन की विफलता के तौर पर पेश करे। BJP इसे ‘भ्रष्टाचार पर प्रहार’ बताकर खुद को एक साफ-सुथरे विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहती है।

सत्ता पक्ष (TMC) का नैरेटिव: ‘राजनीतिक प्रतिशोध और संघीय ढांचे पर हमला’

दूसरी ओर, सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पास इस चक्रव्यूह से निकलने की अपनी एक अलग और आक्रामक रणनीति है।

  • मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी लगातार यह आरोप लगाती रही है कि केंद्र सरकार ED और CBI का इस्तेमाल अपने राजनीतिक विरोधियों को डराने और कुचलने के लिए एक ‘हथियार’ के रूप में कर रही है।

  • TMC इसे बंगाली अस्मिता और ‘संघीय ढांचे (Federal Structure) पर हमले’ से जोड़ देती है। पार्टी का तर्क है कि चुनाव से ठीक पहले होने वाली ये कार्रवाइयां न्याय के लिए नहीं, बल्कि विपक्ष का मनोबल तोड़ने के लिए की जाती हैं।

जनता की अदालत: क्या वोटर पर पड़ता है असर?

सबसे अहम सवाल यह है कि क्या आम वोटर इन छापों से प्रभावित होता है? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शहरी और मध्यम वर्ग के मतदाताओं पर भ्रष्टाचार के आरोपों का गहरा असर पड़ता है। वे इसे सुशासन की कमी मानते हैं।

लेकिन, बंगाल का एक बहुत बड़ा ग्रामीण और ‘लाभार्थी वर्ग’ है, जो राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं (जैसे लक्ष्मीर भंडार, कन्याश्री) से सीधे जुड़ा है। कई बार ये लाभार्थी भ्रष्टाचार के आरोपों को दरकिनार कर अपनी ‘आर्थिक सुरक्षा’ को तरजीह देते हैं।

निष्कर्ष: चुनाव में जीत हार का फैसला चाहे जो भी हो, लेकिन यह तय है कि 2026 का बंगाल चुनाव भी ED और CBI के साये से अछूता नहीं रहेगा।

एजेंसियों की हर रेड, हर समन और हर गिरफ्तारी इस चुनाव में एक नया सियासी तूफान खड़ा करेगी। देखना दिलचस्प होगा कि जनता ‘भ्रष्टाचार’ के दावों पर मुहर लगाती है, या ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ की दलीलों पर भरोसा जताती है। फैसला 4 मई को EVM से ही निकलेगा।

Santosh SETH

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