भोजशाला और ज्ञानवापी पर मुस्लिम समाज से सौहार्दपूर्ण अपील

भोजशाला और ज्ञानवापी पर मुस्लिम समाज से सौहार्दपूर्ण अपील

भोजशाला और ज्ञानवापी: क्या मुस्लिम समाज ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ को जुमले से वास्तविकता में बदलेगा?

संपादकीय/विशेष विश्लेषण: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

इतिहास के पन्नों में दर्ज कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें चाहकर भी कानूनी दांव-पेंचों से हमेशा के लिए छिपाया नहीं जा सकता।

आज जब हम धार की ‘भोजशाला’ और काशी की ‘ज्ञानवापी’ जैसे सांस्कृतिक केंद्रों की ओर देखते हैं, तो केवल पत्थर की दीवारें नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान की एक गौरवशाली परंपरा और उसके विध्वंस का दर्द सुनाई देता है।

क्या यह समय नहीं है कि भारतीय मुस्लिम समाज अपनी पुरानी हठधर्मिता को छोड़कर इतिहास की इस कड़वाहट को सौहार्द से बदलने की पहल करे?

वैज्ञानिक प्रमाण और अकाट्य सत्य

भोजशाला, जिसे परमार वंश के राजा भोज ने 1034 में एक संस्कृत पाठशाला और वाग्देवी (सरस्वती) मंदिर के रूप में स्थापित किया था, आज भारतीय पुरातात्विक साक्ष्यों का केंद्र बनी है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा हालिया वैज्ञानिक सर्वेक्षण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यहाँ की वास्तुकला, दीवारों पर उकेरे गए संस्कृत व्याकरण के मंत्र, और सनातन देवी-देवताओं की खंडित प्रतिमाएं यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि यह स्थल मूलतः क्या था। यह महज आस्था का विषय नहीं, बल्कि अकाट्य ऐतिहासिक साक्ष्य है।

‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का अग्नि-परीक्षा

अक्सर ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का नाम लिया जाता है, लेकिन क्या यह केवल एक जुमला बनकर रह गया है?

यदि मुस्लिम समाज का नेतृत्व करने वाले मौलवी, मुस्लिम स्कॉलर्स और बुद्धिजीवी वास्तव में देश की एकता और भाईचारे में विश्वास रखते हैं, तो उनके लिए यह सर्वाधिक सटीक अवसर है।

क्यों न मुस्लिम समाज इन स्थलों को स्वेच्छा से हिंदू समाज को सौंपकर एक नई नजीर पेश करे? यदि मुस्लिम नेता और आलिम वर्ग आगे बढ़कर यह संदेश देते हैं कि “ये स्थान आपकी आस्था के केंद्र हैं, हम ससम्मान मार्ग प्रशस्त करते हैं,” तो यह उनके बड़प्पन और सहिष्णुता का सबसे बड़ा उदाहरण होगा।

सियासी ठेकेदारों से मुक्ति की जरूरत

देश का आम मुसलमान अमन और तरक्की चाहता है। समस्या उन स्वार्थी नेताओं और वोट बैंक की राजनीति करने वाले तत्वों की है, जो अपनी दुकान चमकाने के लिए आम मुसलमानों के मन में अकारण भय पैदा करते हैं। वे डर फैलाते हैं कि “एक मस्जिद छोड़ी तो सब छीन लिया जाएगा।”

मुस्लिम समाज को अब आत्ममंथन करना होगा। उन्हें अपनी कमान अड़ियल रुख वाले नेताओं के हाथ से छीनकर उन प्रगतिशील और उदारवादी चेहरों को सौंपनी होगी, जो देश की मुख्यधारा के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में विश्वास रखते हैं।

समझौता: अदालतों से ऊपर दिलों का जुड़ाव

अदालती फैसले कानून की सीमाओं में बंधे होते हैं, लेकिन दिलों को जोड़ने का काम केवल संवाद से होता है।

यदि मुस्लिम समाज सुप्रीम कोर्ट में अपील दर अपील करने के बजाय सीधे हिंदू समाज के संतों और प्रतिनिधियों के साथ बैठकर सौहार्दपूर्ण समझौता कर ले, तो यह पूरे विश्व के समक्ष भारतीय संस्कृति की एक अनुपम मिसाल होगी।

यह अवसर इतिहास को बदलने का है। कड़वाहट की विरासत को पीछे छोड़कर, ऐतिहासिक सत्य को स्वीकार कर सम्मानपूर्वक मार्ग प्रशस्त करना ही एक प्रबुद्ध समाज की पहचान है।

भारतीय मुसलमानों को यह स्वीकार करना होगा कि उनकी जड़ें इसी मिट्टी से जुड़ी हैं, न कि किसी विदेशी आक्रांता से।

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