अमेरिका का बड़ा फैसला: रूसी तेल खरीद पर छूट बढ़ाई
अमेरिका का बड़ा फैसला: रूसी तेल खरीदने की छूट एक महीने बढ़ाई, समुद्र में फंसे 12 करोड़ बैरल तेल से भारत को मिलेगी राहत”
वाशिंगटन/नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
दुनियाभर में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों और ऊर्जा संकट के बीच अमेरिका ने एक अहम फैसला लिया है। अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने की अपनी मंजूरी को एक महीने के लिए और बढ़ा दिया है।
इस कदम से भारत सहित अन्य एशियाई देशों को समुद्र में फंसे रूसी तेल को खरीदने का मौका मिलेगा, जिससे अल्पकालिक आपूर्ति का जोखिम कम होगा। हालांकि, बदले वैश्विक हालात में इसके लिए अब ज्यादा कीमत चुकानी होगी।
समुद्र में मौजूद है 12.4 करोड़ बैरल तेल, भारत को सबसे ज्यादा फायदा
अमेरिका के वित्त विभाग के दस्तावेजों के अनुसार, यह छूट उन रूसी पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू होगी जो वर्तमान में जहाजों पर लादे जा चुके हैं।
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कितना है तेल? सीबीएस न्यूज (CBS News) की रिपोर्ट के मुताबिक, इस समय दुनियाभर के समुद्रों में करीब 12.4 करोड़ बैरल रूसी तेल मौजूद है।
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क्या गिरेगी कीमत? डच बैंक आईएनजी (ING) के कमोडिटीज स्ट्रेटेजी हेड वारेन पैटरसन का मानना है कि इस कदम से आपूर्ति जरूर बढ़ेगी, लेकिन कीमतों पर बहुत बड़ा असर नहीं पड़ेगा।
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इसका कारण यह है कि 12 करोड़ बैरल तेल वैश्विक मांग (10.4 करोड़ बैरल प्रतिदिन) के एक दिन के बराबर ही है।
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पैटरसन के अनुसार, तेल बाजार के लिए स्थायी समाधान केवल ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ से आपूर्ति का सुचारू होना है।
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फिलहाल, इस नए उपलब्ध रूसी तेल को खरीदने की सर्वाधिक संभावना भारत और अन्य एशियाई देशों की ही है।
अमेरिका का दावा- ‘रूस को नहीं होगा कोई लाभ’
अमेरिकी वित्त विभाग ने स्पष्ट किया है कि इस अल्पकालिक छूट से रूस को कोई सीधा वित्तीय लाभ नहीं होगा।
अमेरिका का तर्क है कि रूस अपनी ऊर्जा का अधिकांश राजस्व ‘पॉइंट ऑफ एक्सट्रैक्शन’ (जहां से तेल निकाला जाता है) पर लगने वाले टैक्स से प्राप्त करता है, न कि समुद्र में फंसे इस माल से।
महंगा हुआ रूसी तेल, उराल और ब्रेंट क्रूड का अंतर घटा
ईरान संकट शुरू होने के बाद से रूसी उराल (Russian Urals) और ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) के बीच कीमतों का अंतर काफी कम हो गया है।
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मंगलवार को रूसी उराल 101-102 डॉलर और ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
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रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले (फरवरी में) रूसी उराल 55 डॉलर और ब्रेंट क्रूड का भाव 70 डॉलर के आसपास था।
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अब इन दोनों के बीच का अंतर सिर्फ 8 डॉलर का रह गया है, जो युद्ध से पहले 15 डॉलर प्रति बैरल हुआ करता था।
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इसका सीधा मतलब है कि रूसी तेल बाजार में आएगा तो जरूर, लेकिन पहले की तरह सस्ते दाम पर नहीं मिलेगा।
भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?
भारत के लिए यह अमेरिकी फैसला कूटनीतिक और आर्थिक, दोनों मोर्चों पर अहम है। भारत इस अतिरिक्त रूसी तेल को खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित कर सकता है।
रूस वर्तमान में भारत के लिए सस्ते तेल का एक प्रमुख स्रोत बना हुआ है। यह अमेरिकी छूट जब तक जारी रहेगी, तब तक भारतीय रिफाइनरियां कम कानूनी जोखिमों के साथ मौजूदा व्यापार प्रवाह को बनाए रख सकेंगी।
इसके अलावा, यह छूट भारत को पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों से सीधे टकराए बिना अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी बड़ी मदद करेगी।











