5 राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद राष्ट्रीय राजनीति में होगा बड़ा उलटफेर
5 राज्यों के चुनाव नतीजों के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में बड़े उलटफेर की आहट: BJP और कांग्रेस में होने जा रहा है भारी संगठनात्मक बदलाव
नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
देश के चार राज्यों (असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल) और एक केंद्र शासित प्रदेश (पुडुचेरी) में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे 4 मई को घोषित होने वाले हैं।
मतदान के बाद आए एग्जिट पोल ने सियासी सरगर्मियां तेज कर दी हैं। इस बार के चुनाव केवल इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों का फैसला नहीं करेंगे, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए (NDA) और ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के भविष्य की दिशा भी तय करेंगे।
इसके साथ ही, इन नतीजों के तुरंत बाद देश की दो सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों—भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस—में संगठन के स्तर पर भारी फेरबदल देखने को मिलने वाला है।
लेफ्ट के अस्तित्व पर संकट और क्षेत्रीय दलों की साख दांव पर
इस बार के विधानसभा चुनाव कई मायनों में बेहद खास हैं। जहां एक तरफ कांग्रेस और बीजेपी की साख दांव पर है।
वहीं दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस (TMC), डीएमके (DMK) और एआईएडीएमके (AIADMK) जैसे ताकतवर क्षेत्रीय दलों की प्रतिष्ठा का भी फैसला होना है।
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लेफ्ट फ्रंट का ‘करो या मरो’: वामपंथी दलों (Left Front) के लिए यह चुनाव सबसे बड़ी चुनौती है। त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल से वे पहले ही बाहर हो चुके हैं।
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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि केरल की सत्ता भी उनके हाथ से फिसल गई, तो वामपंथी दलों के सामने राष्ट्रीय राजनीति में अपने अस्तित्व को बचाने का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।
BJP: ‘नितिन नवीन युग’ में युवा टीम बनाने की तैयारी
बीजेपी ने 46 वर्षीय नितिन नवीन को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर बदलाव का स्पष्ट संकेत कई महीने पहले ही दे दिया था। अब चुनावी नतीजों के बाद पार्टी के ढांचे और सरकार में बड़े फेरबदल की रूपरेखा तैयार है।
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बुजुर्ग नेताओं की विदाई की चुनौती: पार्टी आलाकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती बुजुर्ग हो चुके नेताओं को संगठन से बाहर रहने के लिए मनाना है। सबसे युवा अध्यक्ष चुनने के बाद पार्टी अपनी पूरी टीम को युवा चेहरों से ही भरना चाहती है।
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संगठन का पूरा कायाकल्प: युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की अध्यक्षता में पार्टी के सर्वोच्च निकाय ‘संसदीय बोर्ड’ और ‘केंद्रीय चुनाव समिति’ का पुनर्गठन होना है।
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इसके अलावा नए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, महासचिव, सचिव, प्रवक्ता और विभिन्न मोर्चों के प्रमुखों की नियुक्ति की जाएगी।
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युवा और महिलाओं पर फोकस: नई टीम में युवा और अनुभवी नेताओं के बीच संतुलन बनाने के साथ-साथ महिलाओं को भी ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की रणनीति है।
माना जा रहा है कि 4 मई को चुनावी नतीजे आने के 10-15 दिनों के भीतर नितिन नवीन की नई राष्ट्रीय टीम का ऐलान हो सकता है, जिसके बाद बीजेपी मुख्यालय का स्वरूप पूरी तरह बदला-बदला नजर आएगा।
कांग्रेस: युवा अध्यक्ष की तलाश, क्या सचिन पायलट को मिलेगी कमान?
बीजेपी द्वारा 46 वर्षीय नितिन नवीन को अध्यक्ष बनाए जाने के बाद, कांग्रेस के भीतर भी युवा नेतृत्व को लेकर राहुल और सोनिया गांधी के सामने दुविधा की स्थिति पैदा हो गई है। 2029 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस को एक युवा टीम की सख्त जरूरत है।
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मल्लिकार्जुन खड़गे जाएंगे कर्नाटक? पार्टी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे एक परिपक्व नेता हैं, लेकिन चर्चा है कि कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच चल रही गुटबाजी पर लगाम कसने के लिए खड़गे को वहां का मुख्यमंत्री बनाकर भेजा जा सकता है।
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अगर ऐसा हुआ, तो कांग्रेस को दिल्ली में नया राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा में अपना नया नेता भी चुनना होगा।
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राहुल गांधी अपनी जिद पर कायम: सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी अभी भी इस बात पर अड़े हैं कि गांधी परिवार का कोई भी व्यक्ति पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बनेगा।
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सचिन पायलट का नाम सबसे आगे: राहुल और प्रियंका गांधी वाड्रा के चहेते माने जाने वाले सचिन पायलट का नाम अध्यक्ष पद की रेस में सबसे आगे चल रहा है। उन्हें पार्टी की कमान सौंपी जा सकती है।
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अशोक गहलोत का ‘खेला’: हालांकि, पायलट की राह इतनी आसान नहीं है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत लगातार पायलट की पुरानी बगावत का किस्सा सुनाकर उनके रास्ते में रोड़े अटकाने की कोशिश कर रहे हैं।
यदि पायलट का नाम पीछे छूट भी जाता है, तो भी कांग्रेस को एक नया और युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष खोजना ही पड़ेगा। इसके साथ ही किसी युवा नेता को राष्ट्रीय संगठन महासचिव की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है।
निष्कर्ष: यह लगभग तय माना जा रहा है कि मई के महीने में ही बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन में व्यापक बदलाव हो जाएंगे।
हालांकि, कांग्रेस में बदलाव की यह रफ्तार अपनी अंदरूनी गुटबाजी और मंथन के कारण थोड़ी धीमी हो सकती है, लेकिन वहां भी बड़े फैसले लिए जाने तय हैं।











