महाराष्ट्र में बड़ा सियासी उलटफेर: ठाकरे बंधुओं में पड़ी दरार, राज ठाकरे ने उद्धव का साथ छोड़ शिंदे गुट से मिलाया हाथ
“महाराष्ट्र की राजनीति में ‘ठाकरे ब्रांड’ के एकीकरण का सपना चुनाव नतीजे आते ही टूट गया है। नगर निकाय चुनाव खत्म होते ही राज ठाकरे (MNS) और उद्धव ठाकरे (Shiv Sena UBT) के बीच की दरार एक बार फिर जगजाहिर हो गई है”
मुंबई/कल्याण | The Politics Again ब्यूरो [संतोष सेठ की रिपोर्ट ]
कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका (KDMC) चुनाव में एक साथ गठबंधन में लड़ने के बावजूद, नतीजों के बाद राज ठाकरे ने यू-टर्न लेते हुए मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना (शिंदे गुट) को समर्थन देने का आधिकारिक ऐलान कर दिया है।
यह उद्धव ठाकरे के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान दोनों भाइयों ने एक संयुक्त मोर्चे के रूप में विपक्ष की भूमिका निभाने का संकेत दिया था।
कल्याण-डोंबिवली का गणित: किसकी कितनी ताकत?
कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका (KDMC) के चुनाव परिणाम स्पष्ट जनादेश दिखाते हैं। यहाँ कुल 122 पार्षद सीटें हैं और बहुमत का जादुई आंकड़ा 62 है।
ताजा चुनाव परिणामों के अनुसार दलीय स्थिति इस प्रकार है:
| पार्टी/गुट | जीते हुए पार्षद |
| शिवसेना (शिंदे गुट) | 53 |
| भाजपा (BJP) | 50 |
| शिवसेना (UBT – उद्धव गुट) | 11 |
| मनसे (MNS – राज ठाकरे) | 05 |
| कांग्रेस | 02 |
| एनसीपी (शरद पवार) | 01 |
आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के पास मिलकर 103 सीटें हैं, जो बहुमत के आंकड़े (62) से कहीं ज्यादा है।
इसका अर्थ है कि शिंदे सरकार को यहाँ सत्ता बनाने के लिए राज ठाकरे के 5 पार्षदों की गणितीय आवश्यकता नहीं थी।
इसके बावजूद, राज ठाकरे का शिंदे गुट को समर्थन देना एक बड़ा रणनीतिक और प्रतीकात्मक संदेश है।
फेल हुआ ‘ठाकरे गठबंधन’ का प्रयोग
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में राज और उद्धव का साथ आना एक बड़ा प्रयोग था, जो पूरी तरह विफल रहा।
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बीएमसी (BMC) में करारी हार: मुंबई महानगरपालिका समेत राज्य की अन्य निकायों में भी ठाकरे बंधुओं का जादू नहीं चल सका।
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विपक्ष में बैठने से इनकार: उम्मीद थी कि परिणाम चाहे जो भी हों, राज ठाकरे उद्धव के साथ विपक्ष में बैठेंगे। लेकिन, उन्होंने सत्ता पक्ष (शिंदे गुट) के साथ जाना बेहतर समझा।
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शिंदे की मजबूत पकड़: कल्याण-डोंबिवली, जो एकनाथ शिंदे का गढ़ माना जाता है, वहां शिंदे सेना सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जिसने यह साबित कर दिया कि जमीनी शिवसैनिक अब भी उनके साथ हैं।
क्या हैं इस समर्थन के मायने?
राज ठाकरे के इस कदम से यह स्पष्ट हो गया है कि भविष्य की राजनीति में वे उद्धव ठाकरे के ‘मातोश्री’ की बजाय एकनाथ शिंदे और भाजपा गठबंधन के करीब रहना पसंद करेंगे।
103 पार्षदों के विशाल बहुमत के साथ सत्ता में आ रही शिंदे-भाजपा युति के साथ एमएनएस के 5 पार्षदों का जुड़ना उद्धव गुट को और अधिक अलग-थलग करने की रणनीति का हिस्सा है।
The Politics Again का नज़रिया:
कल्याण-डोंबिवली के नतीजे और उसके बाद का यह घटनाक्रम महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे के लिए खतरे की घंटी है।
परिवार का साथ भी उन्हें चुनावी वैतरणी पार नहीं करा सका, और अब चुनाव बाद उस साथ का टूटना उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए नई चुनौतियां खड़ी करेगा।












