UP Minister Om Prakash Rajbhar addressing a public gathering, advocating for the division of Uttar Pradesh into four states

यूपी के 4 हिस्से? जानिए! ओपी राजभर का के दावे के क्या है सियासी मायने

यूपी के 4 टुकड़े और पूर्वांचल का पहला CM राजभर? ओम प्रकाश राजभर के बयान से गरमाई सियासत, जानें क्या है मायावती कनेक्शन”

लखनऊ: संतोष सेठ की रिपोर्ट : (THE POLITICS AGAIN)

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात अभी बिछनी शुरू ही हुई है कि राज्य के पुनर्गठन और बंटवारे का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है।

उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने यह दावा कर सियासी हलचल तेज कर दी है कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश चार हिस्सों (पूर्वांचल, मध्यांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश) में बंटेगा।

राजभर ने सिर्फ नक्शे पर लकीर खींचने की बात नहीं की, बल्कि यहां तक ऐलान कर दिया कि अलग राज्य बनने पर पूर्वांचल का पहला मुख्यमंत्री राजभर समाज का ही कोई बेटा होगा।

पीएम मोदी से बातचीत का हवाला और जातीय जनगणना की शर्त

देवरिया और अंबेडकरनगर में जनसभाओं को संबोधित करते हुए ओम प्रकाश राजभर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी कथित बातचीत का हवाला दिया।

उन्होंने दावा किया कि देश में ‘जातीय जनगणना’ (Caste Census) पूरी होने के बाद राज्य के पुनर्गठन का रास्ता पूरी तरह साफ हो जाएगा।

राजभर का तर्क है कि पूर्वांचल में राजभर समाज का एक बड़ा और निर्णायक वोटबैंक है, इसलिए सत्ता के शीर्ष पर पहला हक उन्हीं के समाज का बनता है।

उनका यह बयान विशुद्ध रूप से जातीय और क्षेत्रीय अस्मिता को उभारने की एक सोची-समझी राजनीतिक कवायद माना जा रहा है।

मायावती का 2011 का मास्टरस्ट्रोक: जब पास हुआ था प्रस्ताव

उत्तर प्रदेश को बांटने की यह मांग कोई नई नहीं है। दो दशक से अधिक समय से हरित प्रदेश, पूर्वांचल और बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने की मांगें उठती रही हैं।

इसका सबसे बड़ा और ठोस राजनीतिक प्रयास नवंबर 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने किया था।

बसपा सरकार ने विधानसभा में बाकायदा एक प्रस्ताव पारित कर उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों—पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश—में बांटने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी थी।

मायावती का तर्क था कि इतने विशाल राज्य में प्रशासनिक नियंत्रण और सुचारू विकास कठिन है। हालांकि, बाद में केंद्र सरकार (2014) ने संसद में स्पष्ट किया था कि राज्य सरकार द्वारा पर्याप्त जानकारी न दिए जाने के कारण यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।

आखिरी फैसला लखनऊ का नहीं, दिल्ली का

राज्य के बंटवारे की हकीकत केवल सियासी बयानों से तय नहीं होती। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 यह स्पष्ट करता है कि किसी भी नए राज्य के गठन या मौजूदा राज्य की सीमाओं में बदलाव का एकाधिकार केवल संसद के पास है।

इसके लिए राष्ट्रपति की सिफारिश अनिवार्य है। हालांकि प्रभावित राज्य की विधानसभा से विचार मांगे जाते हैं, लेकिन उसकी सहमति बाध्यकारी नहीं होती।

यानी यदि यूपी के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू भी होती है, तो यह एक लंबी संवैधानिक और वित्तीय (राजधानी, हाईकोर्ट, संपत्तियों और राजस्व का बंटवारा) प्रक्रिया से गुजरेगी।

सियासी बयानों का दौर शुरू: कोई समर्थन में, कोई बता रहा ‘जुमला’

राजभर के इस बयान के बाद प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है:

  • विरोधी सुर: भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने इसे विशुद्ध ‘चुनावी जुमला’ करार देते हुए कहा है कि केंद्र या प्रदेश सरकार की यूपी को बांटने की कोई मंशा नहीं है। विपक्ष ने भी इसे असली मुद्दों (महंगाई, बेरोजगारी) से ध्यान भटकाने की चाल बताया है।

  • समर्थन: दूसरी ओर, पश्चिमी यूपी के कद्दावर नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान ने यूपी को चार हिस्सों में बांटने के विचार का खुला समर्थन किया है, जो हरित प्रदेश की पुरानी मांग को बल देता है।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राजभर का यह बयान महज 2027 के चुनाव से पहले सियासी माहौल गरमाने का एक हथकंडा साबित होता है, या वास्तव में देश के सबसे बड़े सूबे के भूगोल को बदलने की कोई अंदरूनी पटकथा तैयार हो रही है।