⚛️ SHANTI बिल 2025: भारत की परमाणु ऊर्जा नीति में ऐतिहासिक बदलाव

“सरकार ने सोमवार को लोकसभा में सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) बिल 2025 पेश किया। यह विधेयक दशकों पुराने सरकारी एकाधिकार को समाप्त करते हुए निजी क्षेत्र के लिए परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के द्वार खोलता है”

नई दिल्ली 16 / 12 / 2025 संतोष सेठ की रिपोर्ट 

लोकसभा में पेश SHANTI बिल 2025 भारत की न्यूक्लियर नीति में ऐतिहासिक सुधार है। इससे सरकारी एकाधिकार खत्म होगा, निजी कंपनियों की एंट्री संभव होगी, और लायबिलिटी नियम आसान होंगे।

📜 विधेयक का उद्देश्य और महत्व

प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री, जितेंद्र सिंह ने बताया कि SHANTI बिल का लक्ष्य भारत के बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करना है, जिसमें शामिल हैं:

  • ऊर्जा मिश्रण में वृद्धि: देश की ऊर्जा उत्पादन में परमाणु ऊर्जा का हिस्सा बढ़ाना।

  • अनुसंधान को बढ़ावा: न्यूक्लियर साइंस और टेक्नोलॉजी में नई खोजों को बढ़ावा देना।

  • अंतर्राष्ट्रीय दायित्व: न्यूक्लियर सेफ्टी, सिक्योरिटी और सेफगार्ड्स पर अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करना।

🚫 प्रस्तावित कानूनी बदलाव (पुराने कानूनों की समाप्ति)

यदि यह बिल संसद के दोनों सदनों से पारित हो जाता है, तो यह निम्न दो महत्वपूर्ण कानूनों को रद्द कर देगा:

  1. एटॉमिक एनर्जी एक्ट, 1962 (जो सरकारी एकाधिकार की नींव था)

  2. सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट, 2010 (जिसे विदेशी भागीदारों के लिए निवेश में बड़ी बाधा माना जाता था)

🔑 SHANTI बिल 2025 के प्रमुख प्रस्ताव

यह बिल भारत की परमाणु नीति के तीन प्रमुख स्तंभों को बदलता है: निजी भागीदारी, दायित्व व्यवस्था और नियामक संरचना।

1. निजी क्षेत्र की भागीदारी का विस्तार

  • लाइसेंसिंग: भारतीय निजी कंपनियां अब न्यूक्लियर पावर प्लांट और रिएक्टर बनाने, उनकी मालिक बनने, उन्हें चलाने और बंद करने के लिए लाइसेंस ले सकेंगी।

  • गतिविधियाँ: पंजीकृत भारतीय निजी कंपनियां अब निम्न कार्य भी कर सकेंगी:

    • न्यूक्लियर फ्यूल बनाना।

    • न्यूक्लियर और स्पेंट फ्यूल की ढुलाई और स्टोरेज।

    • निर्धारित उपकरण, टेक्नोलॉजी या सॉफ्टवेयर का आयात-निर्यात।

  • सीमाएँ:

    • भारत के बाहर पंजीकृत या विदेशी नियंत्रण वाली कंपनियों को लाइसेंस नहीं मिलेगा।

    • संवेदनशील कार्य जैसे फ्यूल एनरिचमेंट, स्पेंट फ्यूल रीप्रोसेसिंग और हैवी वॉटर प्रोडक्शन सिर्फ सरकार के हाथ में रहेंगे।

2. न्यूक्लियर डैमेज के लिए नई सिविल लायबिलिटी व्यवस्था

यह खंड विदेशी सप्लायर्स की सबसे बड़ी चिंता को दूर करता है।

पहलू SHANTI बिल में प्रावधान अंतर्राष्ट्रीय मानक
दायित्व का केंद्र न्यूक्लियर हादसे की जिम्मेदारी सिर्फ प्लांट ऑपरेटर पर होगी। यह सुनिश्चित करता है कि सप्लायर्स (विदेशी विक्रेता) पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी।
अधिकतम जिम्मेदारी (कैप) अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा तय स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) के 300 मिलियन के बराबर रुपये में। यह अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है।
बीमा/फंड की आवश्यकता ऑपरेटरों को रिएक्टर के आकार के आधार पर 11 मिलियन डॉलर से 330 मिलियन डॉलर तक का बीमा या लायबिलिटी फंड रखना होगा।  
सरकारी समर्थन कैप से अधिक क्लेम के लिए अलग न्यूक्लियर लायबिलिटी फंड होगा। अगर नुकसान कैप से ज्यादा हुआ, तो सरकार मदद करेगी।  

3. सुरक्षा और नियामक ढांचे में सुधार

  • AERB को कानूनी दर्जा: बिल एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (AERB) को कानूनी दर्जा प्रदान करेगा, जो अभी तक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर से संचालित होता था। इससे सुरक्षा और निगरानी तंत्र मजबूत होगा।

  • विवाद निवारण: विवादों को सुलझाने के लिए एटॉमिक एनर्जी रिड्रेसल एडवाइजरी काउंसिल बनाई जाएगी।

  • सजा का प्रावधान: उल्लंघनों के लिए सख्त सजा का प्रस्ताव है, जिसमें गंभीर अपराधों पर ₹1 करोड़ तक का जुर्माना शामिल है।

🌟 बिल का महत्व और जलवायु लक्ष्य

यह बिल भारत के ऊर्जा और जलवायु लक्ष्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  • क्षमता वृद्धि: भारत का लक्ष्य 2047 तक न्यूक्लियर पावर कैपेसिटी को मौजूदा 8.2 गीगावॉट से बढ़ाकर 100 गीगावॉट करना है। निजी क्षेत्र की भागीदारी इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।

  • नेट-जीरो: यह 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के भारत के जलवायु लक्ष्यों से भी जुड़ा हुआ है, क्योंकि परमाणु ऊर्जा कार्बन-मुक्त बिजली का एक स्थिर स्रोत है।

बड़ी भारतीय कंपनियां (जैसे टाटा पावर, अडानी पावर, रिलायंस इंडस्ट्रीज) और विदेशी सप्लायर्स (जैसे वेस्टिंगहाउस, ईडीएफ, रोसाटॉम) ने पहले ही निवेश में रुचि दिखाई है, जिससे यह बिल पारित होने पर अरबों रुपये के निवेश का मार्ग खुल जाएगा।

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