Satellite view and ground images of rapidly expanding glacial lakes in Himachal Pradesh and Tibet posing flood risks

हिमाचल में नेपाल जैसी तबाही का खतरा: बनीं 2,292 ग्लेशियर झीलें

नेपाल के बाद अब हिमाचल पर मंडराया जल प्रलय का खतरा: सतलुज बेसिन में बनीं 2,292 ‘मौत की झीलें’

शिमला : संतोष सेठ की रिपोर्ट : THE POLITICS AGAIN

नेपाल में ग्लेशियर टूटने से मची भारी तबाही के बाद अब भारत के हिमालयी राज्यों—हिमाचल प्रदेश, पंजाब और जम्मू-कश्मीर पर भी इसी तरह के प्राकृतिक प्रकोप का खतरा मंडराने लगा है।

हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण परिषद (हिमकोस्टे) के ताजा उपग्रह अध्ययन ने एक चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है, जिसमें तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के कारण हजारों खतरनाक झीलें (GLOF) उभर कर सामने आई हैं।

2,292 झीलों का खौफ और तिब्बत का ‘अदृश्य’ खतरा

हिमकोस्टे द्वारा लिस-4 उपग्रह (2023 डेटा) के जरिए किए गए अध्ययन के अनुसार, ग्लेशियरों के पिघलने से हालात बेहद खतरनाक हो गए हैं:

  • सतलुज बेसिन: अकेले इस बेसिन में 2,292 ग्लेशियल झीलें बन चुकी हैं।

  • तिब्बत में खतरा: इनमें से 1,335 झीलें चीन अधिकृत तिब्बत में हैं, जहां भारत का सीधा नियंत्रण न होने के कारण उपग्रह आधारित निगरानी ही एकमात्र विकल्प है।

  • हिमाचल की स्थिति: 470 झीलें स्पीति में और 487 किन्नौर के खाब क्षेत्र में मौजूद हैं। इनमें से 49 झीलें 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैल चुकी हैं।

  • अन्य बेसिन: चिनाब (242 झीलें), ब्यास (93) और रावी (38) बेसिन में भी जल प्रलय का सीधा जोखिम बना हुआ है।

सबसे खतरनाक हैं ये झीलें

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और विशेषज्ञों ने इन झीलों को ‘टिकिंग टाइम बम’ बताया है:

  • गीपनगाथ (घेपल) झील: लाहौल-स्पीति के सिस्सू के पास मौजूद यह झील 1975 में महज 27 हेक्टेयर की थी, जो अब 110 हेक्टेयर तक फैल चुकी है। 36 मीटर गहरी यह झील फटी, तो उदयपुर से लेकर जम्मू-कश्मीर तक तबाही मच सकती है।

  • यारपाबंग झील: नेपाल त्रासदी के बाद सांगला वैली के देबार कंडे में इस झील (550m x 260m) के बढ़ने से किन्नौर के लोगों में दहशत है।

  • NDMA ने गीपांग, कलका (27.89 हेक्टेयर), बास्पा (18.88 हेक्टेयर) और वासुकी झीलों को सर्वाधिक खतरनाक माना है, जहां ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ (EWS) लगाए जा रहे हैं।

विशेषज्ञों की चेतावनी और इतिहास का सबक

हिमकोस्टे के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. एसएस रंधावा ने चेतावनी दी है कि हिमाचल अब अति संवेदनशील भूकंपीय जोन में है।

नेपाल जैसी स्थिति में यदि भूकंप आता है या हिमस्खलन होता है, तो इन झीलों के प्राकृतिक बांध टूट जाएंगे।

इतिहास इसका गवाह है। वर्ष 2000 में सतलुज की बाढ़ ने 135 जानें ली थीं और ₹1,466 करोड़ का नुकसान किया था।

वहीं, 2005 में तिब्बत की पारछू झील टूटने से वांगतू के पास 10 किमी लंबा NH-22 पूरी तरह बह गया था।

हाइड्रो इंजीनियर आरएल जस्टा के मुताबिक, सतलुज बेसिन का तीन-चौथाई हिस्सा तिब्बत में है, इसलिए अगर वहां कोई झील फटी तो उसका पानी सीधे सतलुज के रास्ते हिमाचल और पंजाब के मैदानी इलाकों को डुबो देगा

सरकारों को तुरंत नदियों के किनारे किसी भी तरह के निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना होगा, अन्यथा यह लापरवाही भारी पड़ सकती है।