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भारत में रसोई गैस दुनिया में सबसे सस्ती क्यों ? पढ़े सिलेंडर की इनसाइड स्टोरी

वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत का ‘मास्टरस्ट्रोक’: होर्मुज़ जलडमरूमध्य विवाद के बावजूद देश में दुनिया की सबसे सस्ती रसोई गैस “

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

एक तरफ जहां पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ‘होर्मुज़ जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) के संकट ने पूरी दुनिया में ऊर्जा और गैस की कीमतों में आग लगा रखी है, वहीं भारत ने एक बार फिर अपने कुशल कूटनीतिक और आर्थिक प्रबंधन का लोहा मनवाया है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रसोई गैस (LPG) के बेंचमार्क में 46% का भारी उछाल आने के बावजूद, भारत सरकार ने आम जनता पर महंगाई का एक रुपये का भी बोझ नहीं पड़ने दिया है।

आंकड़े गवाह हैं कि आज भारतीय गैस सिलेंडर न सिर्फ पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से सस्ता है, बल्कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे विकसित देशों की तुलना में भी इसकी कीमत आधी से भी कम है।

आइए ‘The Politics Again’ की इस विस्तृत रिपोर्ट में समझते हैं कि कैसे भारत सरकार ने 60,000 करोड़ रुपये का घाटा सहकर भी आम जनता की थाली को महंगा होने से बचाया है।

1. अंतरराष्ट्रीय बाजार का सच: 46% महंगा हुआ गैस, पर भारत में दाम स्थिर

घरेलू रसोई गैस की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के ‘सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस’ (Saudi CP) से तय होती हैं, जो प्रोपेन और ब्यूटेन का 50:50 मिश्रण होता है।

  • फरवरी 2026 (संकट से पहले): एलपीजी का सऊदी सीपी लगभग 542.50 डॉलर प्रति टन था।

  • जून 2026 (संकट के बाद): पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बाधाओं के कारण यह कीमत बढ़कर सीधे 790 डॉलर प्रति टन हो गई।

इस प्रकार महज 4 महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी की लागत में लगभग 46% की भारी वृद्धि हुई।

यदि इस लागत को सीधे उपभोक्ताओं पर डाल दिया जाता, तो आज 14.2 किलोग्राम के एक घरेलू सिलेंडर की कीमत ₹1,600 के पार होती। लेकिन सरकार के हस्तक्षेप से ऐसा नहीं हुआ।

2. दुनिया के मुकाबले भारत में कितने सस्ते हैं सिलेंडर? (एक तुलनात्मक नजर)

भारत में ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ (PMUY) के लाभार्थियों को एक सिलेंडर प्रभावी रूप से मात्र ₹642 में मिल रहा है (₹300 की सब्सिडी के बाद)। वहीं, सामान्य उपभोक्ताओं के लिए यह कीमत ₹942 है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों की तुलना करें तो भारतीय उपभोक्ता भारी फायदे में हैं:

देश का नाम

14.2 किग्रा सिलेंडर की कीमत (₹ में)

उज्ज्वला (₹642) के मुकाबले कितना महंगा

भारत (उज्ज्वला लाभार्थी)

₹ 642

सबसे सस्ता

पाकिस्तान

₹ 1,046

लगभग 39% महंगा

नेपाल

₹ 1,207

लगभग 47% महंगा

बांग्लादेश

₹ 1,225 (लगभग)

लगभग 48% महंगा

अमेरिका (USA)

₹ 1,755 (लगभग)

लगभग 63% महंगा

ऑस्ट्रेलिया

₹ 1,765 (लगभग)

लगभग 64% महंगा

कनाडा

₹ 2,411 (लगभग)

लगभग 73% महंगा

(नोट: गैर-उज्ज्वला उपभोक्ता भी वास्तविक बाजार कीमत ₹1600 की तुलना में लगभग ₹700 कम यानी ₹942 ही चुका रहे हैं।)

3. होर्मुज़ संकट में भारत की कुशल कूटनीति और आपूर्ति प्रबंधन

दुनिया का पांचवां हिस्सा तेल और भारत के ऊर्जा आयात का 54% हिस्सा ‘होर्मुज़ जलडमरूमध्य’ से होकर गुजरता है।

संकट के दौरान जब दुनिया भर के व्यापारिक जहाजों के पहिए थम गए थे, तब भारत ने एक बेमिसाल रणनीति अपनाई:

  • सुरक्षित आवाजाही: लगातार कूटनीतिक समन्वय से भारतीय झंडे वाले टैंकरों ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य से बिना किसी बाधा या टोल चुकाए एलपीजी की सुरक्षित खेप निकाली।

  • घरेलू उत्पादन में 60% का इजाफा: आयात पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू एलपीजी उत्पादन को 32 TMT (हजार मीट्रिक टन) से बढ़ाकर रातों-रात 52 TMT तक पहुंचा दिया गया।

  • नए रास्तों की खोज: आपूर्ति बाधित न हो, इसके लिए अमेरिका, कनाडा और अल्जीरिया जैसे देशों से संसाधन जुटाए गए, जिनके रास्ते होर्मुज़ से होकर नहीं जाते हैं।

  • कालाबाजारी पर प्रहार: सब्सिडी वाले घरेलू सिलेंडर होटलों (कमर्शियल) में न जाएं, इसके लिए 90% डिलीवरी को OTP-आधारित सत्यापन (Verification) से जोड़ दिया गया।

4. सरकार और कंपनियों के कंधों पर 60,000 करोड़ का बोझ

उपभोक्ताओं को ₹1600 का सिलेंडर ₹942 (और ₹642) में देने का सीधा मतलब है कि प्रत्येक सिलेंडर पर लगभग ₹700 का भारी नुकसान (Under-recovery) हो रहा है।

  • घाटे का गणित: पिछले वित्तीय वर्ष के अंत तक तेल विपणन कंपनियों (OMCs) का यह नुकसान ₹41,338 करोड़ से बढ़कर ₹60,000 करोड़ तक पहुंच गया था।

  • कैबिनेट का फैसला: आम जनता पर बोझ न पड़े, इसके लिए केंद्रीय कैबिनेट ने तेल कंपनियों को इस घाटे की भरपाई के लिए ₹30,000 करोड़ की एकमुश्त क्षतिपूर्ति मंजूर की है।

  • सब्सिडी का सीधा लाभ: इसके अतिरिक्त 10.58 करोड़ उज्ज्वला लाभार्थियों को हर साल पहले 4 रिफिल पर ₹300/सिलेंडर सीधा उनके बैंक खाते (DBT) में भेजा जा रहा है।

निष्कर्ष:

यह विस्तृत विश्लेषण स्पष्ट करता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में मचे हाहाकार के बीच भारतीय नागरिकों को राहत देना कोई चमत्कार नहीं, बल्कि एक सुनियोजित कूटनीतिक और आर्थिक प्रबंधन का नतीजा है।

हालांकि, उत्पादन लागत को देखते हुए पेट्रोलियम मंत्रालय ने आम उपभोक्ताओं से अपील की है कि वे इस मूल्यवान संसाधन का उपयोग पूरी सावधानी और ऊर्जा-बचत के तरीकों के साथ करें।

Santosh SETH

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