यूपी: प्रशासक बने ग्राम प्रधानों को नहीं मिलेगा मानदेय, जानें नियम
उत्तर प्रदेश: प्रशासक बने ग्राम प्रधानों को नहीं मिलेगा मानदेय, शासन ने स्पष्ट किए नियम”
लखनऊ: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश में पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने के बाद ‘प्रशासक’ (Administrator) की जिम्मेदारी संभाल रहे पूर्व ग्राम प्रधानों को एक बड़ा झटका लगा है।
सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासक के तौर पर काम कर रहे इन ग्राम प्रधानों को अब प्रतिमाह मिलने वाला मानदेय (Honorarium) नहीं दिया जाएगा। उनकी मानदेय जारी रखने की मांग पूरी होने की फिलहाल कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है।
क्या है नियम और क्यों रुका मानदेय?
दरअसल, बीते मई महीने में प्रदेश के ग्राम प्रधानों का पांच वर्ष का कार्यकाल समाप्त हो गया था। कोरोना संकट या अन्य कारणों से चुनाव न होने की स्थिति में पंचायती राज व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए इन्हीं निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ‘प्रशासक’ नियुक्त कर दिया गया था।
शासन के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, सरकारी नियमावली में ‘प्रशासक’ को निर्वाचित ‘ग्राम प्रधान’ का दर्जा प्राप्त नहीं होता है।
पंचायती राज अधिनियम के तहत मानदेय केवल जनता द्वारा निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को देने का नियम है।
यही कारण है कि प्रशासकों को मानदेय जारी नहीं किया जा सकता। इससे पहले जब एडीओ (ADO) पंचायत को प्रशासक नियुक्त किया जाता था, तब भी उन्हें इस कार्य के लिए कोई अतिरिक्त मानदेय नहीं दिया जाता था।
यूपी में पंचायती राज का ढांचा और मानदेय की स्थिति
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के तहत कुल:
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58,213 ग्राम पंचायतें
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827 क्षेत्र पंचायतें (ब्लॉक)
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75 जिला पंचायतें हैं।
निर्वाचित होने पर इन प्रतिनिधियों को सरकार द्वारा प्रतिमाह एक निश्चित मानदेय दिया जाता है, जो इस प्रकार है:
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ग्राम प्रधान: 5,000 रुपये प्रति माह
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ब्लॉक प्रमुख (क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष): 11,300 रुपये प्रति माह
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जिला पंचायत अध्यक्ष: 15,500 रुपये प्रति माह
चूंकि पंचायत का कार्यकाल खत्म होने के बाद अब ये पदाधिकारी आधिकारिक रूप से ‘निर्वाचित प्रतिनिधि’ नहीं रह गए हैं, इसलिए शासन ने तकनीकी और कानूनी नियमों का हवाला देते हुए इनके मानदेय पर रोक लगा दी है।











