विशेष रिपोर्ट : बांग्लादेश में ‘ईशनिंदा’ बना हिंदुओं के खिलाफ हथियार

“बांग्लादेश में ‘ईशनिंदा’ (Blasphemy) अब केवल एक धार्मिक शब्द नहीं रह गया है, बल्कि यह कट्टरपंथी ताकतों के हाथ में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं को निशाना बनाने का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है”

ढाका/नई दिल्ली 28 / 12 / 2025 संतोष सेठ की रिपोर्ट 

‘ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज’ (HRCBM) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में रोंगटे खड़े कर देने वाले खुलासे किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, फर्जी फेसबुक पोस्ट, मनगढ़ंत अफवाहों और बिना पुख्ता सबूतों के आरोपों के जरिए भीड़ को उकसाया जाता है, जिससे न केवल न्याय की हत्या हो रही है, बल्कि इंसानों की जिंदगियां भी तबाह हो रही हैं।

तबाही का ‘फिक्स्ड पैटर्न’: आरोप से आगजनी तक

HRCBM और स्थानीय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इन हमलों में एक बेहद चिंताजनक और व्यवस्थित ‘पैटर्न’ की पहचान की है:

  1. फेक पोस्ट/अफवाह: किसी हिंदू युवक का सोशल मीडिया अकाउंट हैक करना या उसके नाम से फर्जी आपत्तिजनक पोस्ट वायरल करना।

  2. भीड़ का जुटना: अचानक हजारों की संख्या में कट्टरपंथी भीड़ का इकट्ठा होना।

  3. एकतरफा कार्रवाई: पुलिस द्वारा बिना प्राथमिक जांच के अल्पसंख्यक पीड़ित को ही हिरासत में लेना।

  4. सामूहिक हिंसा: पीड़ित के पूरे गांव या मोहल्ले पर हमला, लूटपाट और आगजनी।


दिल दहला देने वाली प्रमुख घटनाएं

1. सुनामगंज: हैकिंग के नाम पर पूरा गांव राख

सुनामगंज के शाल्ला में हुई घटना हाल के वर्षों की सबसे क्रूरतम वारदातों में शुमार है। यहाँ एक हैक किए गए फेसबुक पोस्ट को आधार बनाकर 400 से ज्यादा अल्पसंख्यक परिवारों को निशाना बनाया गया।

भीड़ ने उनके घरों में घुसकर लूटपाट की और फिर उन्हें आग के हवाले कर दिया। आज भी यहाँ के सैकड़ों लोग बेघर और दहशत में जीने को मजबूर हैं।

2. रंगपुर: 17 साल के किशोर पर आरोप और 22 घरों में तोड़फोड़

रंगपुर के गंगाचरा में एक 17 वर्षीय हिंदू किशोर पर कथित ईशनिंदा का आरोप लगा। पुलिस की सुस्ती का फायदा उठाकर दंगाइयों ने 22 हिंदू घरों को मलबे में तब्दील कर दिया। इन परिवारों के पास जान बचाने के लिए रातों-रात भागने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था।

3. खुलना और बरिशाल: जहां रक्षक ही बने भक्षक

खुलना के डाकोप में एक हैरान करने वाला मामला सामने आया। जहाँ एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा हिंदू देवी काली के अपमान के पुख्ता सबूत थे, वहीं पुलिस ने असली अपराधी को पकड़ने के बजाय शिकायतकर्ता पुरबायन मंडल को ही गिरफ्तार कर लिया।

इसी तरह बरिशाल के गौरनदी में एक नाबालिग हिंदू बालक को बिना किसी जांच के तुरंत सलाखों के पीछे भेज दिया गया।


18 दिसंबर को हुई थी दीपू की हत्या

गत 18 दिसंबर मयमनसिंह जिले के भालुका उपजिला में 27 वर्षीय हिंदू दीपू चंद्र दास की जघन्य हत्या कर दी गई थी। गारमेंट फैक्ट्री के कर्मचारी दीपू चंद्र दास पर उसके सहकर्मियों ने ईशनिंदा का आरोप लगाकर फैक्ट्री से बाहर खींचा। उत्तेजित भीड़ ने उन्हें पीट-पीटकर मार डाला।

इसके बाद उसके शव को पेड़ से लटकाया और आग लगा दी। जांच में पता चला कि ईशनिंदा का कोई ठोस सबूत नहीं मिला, फिर भी यह जघन्य अपराध हुआ। अंतरिम सरकार ने 12 लोगों को गिरफ्तार किया है और मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजने का ऐलान किया है।

6 महीने में ईशनिंदा के 73 झूठे मामले

HRCBM की रिपोर्ट के अनुसार जून से दिसंबर 2025 तक 32 जिलों में ईशनिंदा संबंधी 73 झूठे मामले दर्ज हुए, जिनमें हिंदू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया। इनमें पिटाई, लिंचिंग और संपत्ति पर कब्जे की घटनाएं शामिल हैं।

संगठन का कहना है कि कई मामलों में आपसी दुश्मनी, संपत्ति विवाद या अन्य व्यक्तिगत कारणों को छिपाने के लिए ईशनिंदा का बहाना बनाया जाता है। रिपोर्ट में प्रत्येक घटना का विस्तार से जिक्र है।

इसमें पीड़ितों के नाम, स्थान और घटना की तारीख भी दी गई है। इस नवीनतम रिपोर्ट में दीपू दास की हत्या को भी शामिल किया गया है।

शेख हसीना सरकार के पतन के बाद कट्टरपंथी ताकतें सक्रिय

मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद से कट्टरपंथी ताकतें अधिक सक्रिय हो गई हैं, जिससे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर संकट गहरा गया है। 2025 की पहली छमाही में ही 258 सांप्रदायिक हमले दर्ज हुए, जिनमें 27 हत्याएं और कई मंदिरों पर हमले शामिल हैं।

HRCBM ने चेतावनी दी है कि अगर ऐसे मामलों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो अल्पसंख्यक समुदाय में भय का माहौल और बढ़ेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटना की निंदा हुई है। भारत ने इसे गंभीर चिंता का विषय बताया, जबकि एमनेस्टी इंटरनेशनल ने तत्काल जांच और न्याय की मांग की है।

मौलवीबाजार से कुमिल्ला तक: खौफ का साया

मौलवीबाजार, फरीदपुर, चांदपुर और कुमिल्ला जैसे जिलों में बिकाश धर दीप्तो, सागर मंडल, शुभो और नारायण दास जैसे युवाओं के मामले चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यहाँ कानून का राज नहीं, बल्कि भीड़ का तंत्र हावी है। इन मामलों में बाद में आरोप झूठे पाए गए, लेकिन तब तक उन परिवारों का सब कुछ लूट चुका था।

सामाजिक बहिष्कार और जबरन पलायन

हिंसा के बाद भी इन अल्पसंख्यकों की मुसीबतें खत्म नहीं होतीं। जिन परिवारों के घर बच गए, उन्हें धमकियां देकर घर छोड़ने पर मजबूर किया जाता है। उनका सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार किया जाता है ताकि वे अपनी जमीन और संपत्ति औने-पौने दामों में बेचकर देश छोड़ने पर मजबूर हो जाएं।


प्रशासनिक विफलता या मौन सहमति?

HRCBM की रिपोर्ट सवाल उठाती है कि आखिर क्यों हर बार पुलिस और प्रशासन भीड़ को रोकने में नाकाम रहता है? क्यों बिना तकनीकी जांच (Forensic/Cyber Cell) के अल्पसंख्यक युवाओं को जेल भेज दिया जाता है? यह ‘प्रशासनिक सुस्ती’ और ‘भीड़ की मानसिकता’ का मेल बांग्लादेश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को खोखला कर रहा है।

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