“स्वच्छ भारत मिशन, केवल स्वच्छता एवं शौचालयों के क्षेत्र में ही क्रांतिकारी परिवर्तनों का साक्षी नहीं बना है, बल्कि इस मिशन के तहत देश भर के शहरों से प्रतिदिन निकलने वाले कचरे को हर दिन खत्म करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए जा रहे हैं”
नई दिल्ली 05 / 12 / 2025 संतोष सेठ की रिपोर्ट
इसके लिए ‘3R – रिड्यूस, रीयूज, रीसाइकल’ की अवधारणा अपनाकर कचरे का निरंतर निस्तारण किया जा रहा है, साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि नया कचरा कम से कम उत्पन्न हो।
हर दिन निकलने वाले विभिन्न प्रकार के कचरे को खत्म करने के लिए कई तरह के अभिनव प्रयास किए जा रहे हैं, इन्हीं में से एक सर्वश्रेष्ठ अभ्यास सिद्ध हो रही है ‘प्लास्टिक वेस्ट टू रोड कंस्ट्रक्शन’ की अनोखी पहल।
भारत में आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) द्वारा शुरू की गई यह पहल प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण सफलता की कहानी है, जिसे स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (SBM-U) के तहत बढ़ावा दिया जा रहा है।
इस पहल ने शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को गैर-पुनर्चक्रण योग्य प्लास्टिक वेस्ट को शहर के बुनियादी ढांचे, विशेष रूप से सड़कों के निर्माण में उपयोग करने के लिए प्रेरित किया है।
वर्तमान में प्लास्टिक वेस्ट का पुन: इस्तेमाल सड़कों के निर्माण में व्यापक रूप से किया जा रहा है और सभी शहरी स्थानीय निकायों को बिटुमेन सड़कों के निर्माण के दौरान प्लास्टिक वेस्ट का उपयोग करने की सलाह दी गई है।
2015 में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने 5 लाख से अधिक आबादी वाले शहरी क्षेत्रों के 50 किमी की परिधि में नेशनल हाईवे (NH) के नवीनीकरण के लिए बिटुमिनस मिक्स में प्लास्टिक कचरे का उपयोग अनिवार्य कर दिया।
SBM-U के तहत देश भर के नगर निगम क्षेत्रों (ULBs) में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन इकाइयां (PWMUs) और MRF केंद्र स्थापित किए गए, ताकि सड़क निर्माण के लिए निरंतर, संसाधित किए गए प्लास्टिक की आपूर्ति हो सके।
प्लास्टिक वेस्ट का उपयोग सड़क निर्माण में एक प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से किया जाता है, मुख्य रूप से शुष्क प्रक्रिया (Dry Process) के माध्यम से, जहां इसे पारंपरिक कोलतार (बिटुमेन) और गिट्टी (एग्रीगेट) के मिश्रण में मिलाया जाता है।
इस प्रक्रिया में प्लास्टिक, कोलतार के गुणों को बेहतर बनाता है, जिससे सड़कें अधिक टिकाऊ और जल प्रतिरोधी बनती हैं। इस दिशा में एक नई पहल के रूप में सड़क निर्माण में प्लास्टिक कचरे का उपयोग करने के लिए जियोसेल (Geocell) तकनीक का भी इस्तेमाल किया गया है।
हाल ही में इसका पहला बड़ा फील्ड ट्रायल दिल्ली-NCR में DND–फरीदाबाद–KMP एक्सप्रेसवे के लूप संख्या 1 के ऊंचे खंड (elevated section) पर किया गया है।
SBM-U के समर्थन से सभी नगर निगम सड़क निर्माण में प्लास्टिक कचरे के उपयोग की पहल अपना रहे हैं। इस तकनीक में तमिलनाडु सबसे आगे है, जिसने लगभग 17,735 किमी सड़कें बनाई हैं।
कर्नाटक के बेंगलुरु ने 2000 किमी से अधिक सड़कों का निर्माण सफलतापूर्वक किया और कुछ समय पहले हुबली-धारवाड़ में, 1.1 किमी सड़क में 8% प्लास्टिक मिलाकर मज़बूती और टिकाऊपन बढ़ाया गया, जिससे प्रति किमी ₹1.5 लाख की बचत हुई।
असम के गुवाहाटी में 2019 में ही मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज के पायलट प्रोजेक्ट के तहत एक सड़क 1.24 मीट्रिक टन वेस्ट प्लास्टिक का उपयोग करके बनाई गई थी।
उत्तर प्रदेश में लखनऊ के गोमती नगर में भी ऐसी सड़कें बनाई गईं और गाजियाबाद में भी प्लास्टिक वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट लगाए गए हैं। दिल्ली/NCR क्षेत्र में धौला कुआं से IGI एयरपोर्ट रोड और दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे सहित कई राष्ट्रीय राजमार्गों के हिस्सों में प्लास्टिक कचरे का उपयोग हुआ है, साथ ही गुरुग्राम में धमनी सड़कों के लिए प्लास्टिक का उपयोग अनिवार्य है।
पंजाब में रेल कोच फैक्ट्री (RCF) कपूरथला ने पर्यावरण-अनुकूल सड़कों की सराहनीय पहल की, जहां 2020 में RCF टाउनशिप की नई सड़कों को RCF के प्लास्टिक कचरे को बिटुमिन के साथ मिलाकर बनाया गया।
झारखंड का जमशेदपुर इस क्षेत्र में ‘प्लास्टिक बाय बैक पॉलिसी’ लागू करने वाला पहला निगम था, जबकि कई नगर निगम स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को प्लास्टिक संग्रह और श्रेडिंग में शामिल कर स्वच्छता और आजीविका दोनों को बल दे रहे हैं।
वर्तमान में कई राज्यों में शहरों और नगर निगम क्षेत्रों में प्लास्टिक के इस्तेमाल से सड़क निर्माण किया जा चुका है और ज्यादा से ज्यादा प्लास्टिक वेस्ट खपाने के लिए यह प्रक्रिया निरंतर जारी है।
इनमें तमिलनाडु के चेन्नई, महाराष्ट्र के पुणे, कर्नाटक में बेंगलुरु, झारखंड में जमशेदपुर, गुजरात में सूरत, उत्तर प्रदेश में लखनऊ व गाजियाबाद, असम में गुवाहटी, दिल्ली/NCR क्षेत्र, हरियाणा के गुरुग्राम और ओडिशा के कुछ शहरी व ग्रामीण क्षेत्र इत्यादि शामिल हैं।
प्लास्टिक वेस्ट से सड़क निर्माण की यह पहल प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कथन के अनुसार ‘कचरे से कंचन’ की अवधारणा को परिभाषित करती है। स्वच्छ भारत मिशन के दौरान 2014 से लेकर अब 2025 तक, इन 11 वर्षों के दौरान प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन में एक अभूतपूर्व बदलाव लाया गया है।
2021 में SBM-U 2.0 का शुभारंभ’ होने के बाद कचरा मुक्त शहर’ (GFC) के लक्ष्य की ओर ध्यान केंद्रित किया गया, जिसमें प्लास्टिक प्रबंधन और इसके सर्कुलर इकोनॉमी उपयोगों (जैसे सड़क निर्माण) को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई।
मिशन का मुख्य लक्ष्य प्लास्टिक सहित सभी शहरी ठोस कचरे के 100% वैज्ञानिक प्रसंस्करण को सुनिश्चित करना, जिससे लैंडफिल में जाने वाले कचरे की मात्रा शून्य हो जाए।
स्वच्छ भारत मिशन-शहरी के अंतर्गत ‘प्लास्टिक वेस्ट से सड़क निर्माण’ की तकनीक, स्वच्छता को टिकाऊ बुनियादी ढांचे के साथ जोड़ रही है, जो सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के साथ-साथ ‘स्वच्छता से समृद्धि’ और ‘विकसित भारत’ की ओर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है।
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