Charred remains of a sleeper bus highlighting the lack of fire safety and emergency exit measures leading to tragic accidents

मौत का सफर बनीं स्लीपर बसें: 3 साल में 45 अग्निकांड, 64 मौतें, नियम फेल

स्लीपर बसों में अग्निकांड: मौत के सफर में तब्दील होतीं रात की यात्राएं और सुरक्षा मानकों की जमीनी हकीकत”

नई दिल्ली : द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट

चलती स्लीपर बस में आग लगना केवल एक तकनीकी दुर्घटना नहीं है; यह एक ऐसा दुःस्वप्न है जहां कुछ ही मिनटों में धुआं, भीषण गर्मी, बाधित निकासी मार्ग और यात्रियों की घबराहट मिलकर एक बड़े और जानलेवा हादसे का रूप ले लेते हैं।

खासकर रात के समय, जब अधिकांश यात्री गहरी नींद में होते हैं, आग लगने का पता चलने तक स्थिति नियंत्रण से बाहर हो चुकी होती है।

हाल के वर्षों में स्लीपर बसों में आग लगने की बढ़ती घटनाओं ने परिवहन सुरक्षा, वाहन की बनावट और आपातकालीन निकासी (Emergency Exit) व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आंकड़े जो डराते हैं: बस अग्निकांडों की तस्वीर

केंद्र सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) द्वारा e-DAR पोर्टल के आधार पर राज्यसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, वर्ष 2023 से 10 दिसंबर 2025 तक देश में बसों में आग लगने की 45 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 64 लोगों की मौत हुई और 145 लोग घायल हुए।

  • 2023: 11 घटनाएं, 1 मौत

  • 2024: 20 घटनाएं, 31 मौतें

  • 2025 (10 दिसंबर तक): 14 घटनाएं, 32 मौतें

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये आंकड़े पूर्ण नहीं हैं। उदाहरण के लिए, 24 अक्टूबर 2025 को कर्नूल (आंध्र प्रदेश) में हुए भीषण स्लीपर बस हादसे (जिसमें 20 लोगों की मौत हुई थी) को इन 45 घटनाओं में शामिल नहीं किया गया था,

क्योंकि उसके रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट में बस ‘स्लीपर’ के बजाय केवल ‘सीटिंग कैपेसिटी’ दर्ज थी।

हालिया बड़े हादसे जिन्होंने बढ़ाई चिंता

  1. यमुना एक्सप्रेसवे, ग्रेटर नोएडा (24 सितंबर 2026): एक एसी स्लीपर बस में आग लगने से 9 यात्रियों की मौत। शुरुआती जांच में एसी सिस्टम में स्पार्क/ब्लास्ट के बाद इंजन ऑयल में आग लगने की बात सामने आई।

  2. जैसलमेर-जोधपुर (अक्टूबर 2025): इस भीषण हादसे में 21 लोगों की जान गई। बस का मुख्य दरवाजा जाम हो गया था, जिससे यात्री बाहर नहीं निकल पाए और इमरजेंसी एग्जिट को लेकर भारी लापरवाही सामने आई।

  3. कर्नूल, आंध्र प्रदेश (24 अक्टूबर 2025): हैदराबाद से बेंगलुरु जा रही बस एक बाइक से टकराने के बाद आग की चपेट में आ गई, जिससे 20 लोगों की मौत हुई।

  4. बुलढाणा, महाराष्ट्र (1 जुलाई 2023): टायर फटने के बाद बस डिवाइडर से टकराकर पलट गई और डीजल के गर्म एग्जॉस्ट के संपर्क में आने से आग लग गई, जिसमें 25 यात्रियों की दर्दनाक मौत हुई।

चलती बस में आग तेजी से क्यों फैलती है?

विशेषज्ञों और जांच रिपोर्टों के अनुसार, बसों में आग लगने और उसके तेजी से फैलने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  • शॉर्ट सर्किट और वायरिंग: आधुनिक एसी स्लीपर बसों में एसी, लाइट, चार्जिंग पॉइंट जैसे कई इलेक्ट्रिकल सिस्टम होते हैं।

  • वायरिंग में छोटी सी भी खराबी (जैसे ग्रेटर नोएडा हादसे में एसी का स्पार्क) भीषण आग का कारण बन सकती है।

  • दुर्घटना के बाद फ्यूल रिसाव: टक्कर के बाद ईंधन टैंक का फटना और ज्वलनशील ईंधन का गर्म इंजन या एग्जॉस्ट के संपर्क में आना (जैसे बुलढाणा हादसे में)।

  • ज्वलनशील सामग्री: बस के भीतर इस्तेमाल होने वाले गद्दे, पर्दे, सीट कवर और फाइबर जैसी सामग्रियां बहुत तेजी से आग पकड़ती हैं।

  • निकासी मार्ग (स्लीपर लेआउट): स्लीपर बसों का लेआउट (बर्थ और संकरे रास्ते) आपात स्थिति में यात्रियों की निकासी को बेहद मुश्किल बना देता है।

सबसे बड़ा खतरा: आग से पहले धुआं और जाम दरवाजे

आग लगने की स्थिति में यात्रियों की मौत का प्राथमिक कारण अक्सर आग से जलना नहीं, बल्कि दम घुटना होता है।

आग लगते ही बस में जहरीला धुआं भर जाता है, जिससे दृश्यता (Visibility) शून्य हो जाती है।

इसके बाद, अगर मुख्य दरवाजा हाइड्रोलिक लॉक के कारण जाम हो जाए या इमरजेंसी एग्जिट (Emergency Exit) तक पहुंचने का रास्ता सामान या संरचनाओं से बाधित हो, तो बस एक मौत का चैंबर बन जाती है।

इसीलिए फायर सेफ्टी केवल फायर एक्सटिंग्विशर (Fire Extinguisher) टांगने तक सीमित नहीं है, बल्कि आग का तुरंत पता चलने (Fire Alarm) और आसान निकासी मार्ग पर निर्भर करती है।

सरकारी नियम और जमीनी हकीकत

सरकार ने स्लीपर कोच की सुरक्षा के लिए AIS-119 सुरक्षा मानकों में बदलाव किए हैं, जो 1 जुलाई 2025 से पूरी तरह लागू हैं।

इसके अलावा 22 या अधिक यात्रियों वाली बसों में फायर डिटेक्शन (Fire Detection), अलार्म और सप्रेशन सिस्टम (Suppression System) अनिवार्य किया गया है।

फरवरी 2026 तक देश में 49,616 स्लीपर कोच पंजीकृत थे। असली सवाल नियमों की कमी का नहीं, बल्कि उनके वास्तविक अनुपालन का है।

आरटीओ (RTO) स्तर पर फिटनेस चेकिंग में लापरवाही, बस ऑपरेटरों द्वारा पैसे बचाने के लिए मानकों से समझौता और चेसिस पर अवैध रूप से बस बॉडी बनवाना (Illegal Bus Body Building) इन हादसों का मूल कारण है।

जब तक नियमों का सख्ती से पालन और निगरानी सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक रात के समय स्लीपर बसों का सफर ऐसे ही जोखिम भरा बना रहेगा।