राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए पारंपरिक एसटीपी के साथ-साथ प्राकृतिक आर्द्रभूमि और फाइटोरेमेडिएशन जैसी प्रकृति-आधारित तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है।
गंगा और यमुना को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए NMCG की नई रणनीति: एसटीपी के साथ अब ‘प्रकृति-आधारित समाधानों’ (NBS) पर जोर; शुरू हुए दो पायलट प्रोजेक्ट”
नई दिल्ली : THE POLITICS AGAIN डेस्क (एनवायरनमेंट/डेवलपमेंट रिपोर्ट): संतोष सेठ की रिपोर्ट
भारत की जीवनदायिनी नदियों, विशेषकर गंगा और उसकी सहायक नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए अब केवल पारंपरिक इंजीनियरिंग पर निर्भर नहीं रहा जा सकता।
इसी तथ्य को समझते हुए, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) ने नदियों के पुनरुद्धार (Rejuvenation) के लिए अपनी रणनीति में एक बड़ा बदलाव किया है।
एनएमसीजी अब सीवरेज नेटवर्क और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) जैसे पारंपरिक बुनियादी ढांचे के साथ-साथ ‘प्रकृति-आधारित समाधानों’ (Nature-Based Solutions – NBS) को तेजी से मुख्यधारा में ला रहा है।
इसका उद्देश्य इंजीनियरिंग और प्रकृति का एक ऐसा अनूठा संगम तैयार करना है, जिससे नदी का पारिस्थितिक तंत्र (Ecological Health) सुधरे और समाधान लंबे समय तक टिकाऊ बने रहें।
शहरी नालों के गंदे पानी को नदियों में सीधे गिरने से रोकने के लिए, एनएमसीजी ने ‘सतत नदी पुनर्जीवन (SRR)’ कार्यक्रम के तहत निर्मित आर्द्रभूमि (Constructed Wetlands) पर आधारित दो महत्वपूर्ण पायलट परियोजनाएं शुरू की हैं।
ये परियोजनाएं दिल्ली के शास्त्री पार्क नाले और कैलाश नगर नाले पर शुरू की गई हैं।
इन दोनों नालों से रोजाना बड़ी मात्रा में गंदा पानी यमुना नदी में गिरता है। इन परियोजनाओं की संयुक्त उपचार क्षमता लगभग 10 एमएलडी (MLD) है।
कैसे काम करेगी यह प्राकृतिक तकनीक? पारंपरिक एसटीपी भारी मशीनों और बिजली (ऊर्जा) पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं।
इसके विपरीत, ये नई प्रणालियां प्राकृतिक आर्द्रभूमियों (Wetlands) की कार्यप्रणाली की नकल करती हैं:
जल प्रवाह नियंत्रण: पत्थर की चिनाई वाली संरचनाओं से पानी के बहाव को नियंत्रित किया जाएगा।
चट्टानी फिल्टर: निलंबित (Suspended) ठोस कचरे को हटाने के लिए रॉक फिल्टर का उपयोग होगा।
फाइटोरेमेडिएशन (Phytoremediation): विशेष रूप से चुने गए जलीय पौधे लगाए जाएंगे, जो पानी से अतिरिक्त पोषक तत्वों, कार्बनिक प्रदूषण और कुछ भारी धातुओं (Heavy Metals) को सोख कर विघटित कर देंगे।
इन परियोजनाओं से न केवल पानी साफ होगा, बल्कि पानी में घुलित ऑक्सीजन (DO) का स्तर भी बढ़ेगा और रखरखाव की लागत भी बेहद कम आएगी। वर्तमान में इन नालों पर गाद और कीचड़ हटाने का काम तेजी से चल रहा है।
प्रकृति-आधारित समाधानों को सफल बनाने के लिए मजबूत तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत होती है।
इसे ध्यान में रखते हुए, एनएमसीजी ने ‘ज्ञान साझाकरण एवं विकास केंद्र’ (KSDC) के माध्यम से एक व्यापक प्रशिक्षण अभियान चलाया है।
अगस्त 2025 से मार्च 2026 के बीच 6 विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए।
इनमें यमुना टास्क फोर्स, वन विभाग, सिंचाई विभाग, जिला गंगा समितियों और स्वच्छ गंगा राज्य मिशन (SMCG) के 100 से अधिक अधिकारियों और इंजीनियरों ने हिस्सा लिया।
इस ट्रेनिंग का मुख्य फोकस आर्द्रभूमि के निर्माण, पारिस्थितिक बहाली और सतत नदी प्रबंधन के तकनीकी और व्यावहारिक पहलुओं पर था।
इन पायलट परियोजनाओं के अलावा, एनएमसीजी ने उत्तर प्रदेश के खतौली में काली नदी के पुनर्जीवन के लिए भी एक निर्मित आर्द्रभूमि परियोजना लागू की है।
काली नदी गंगा में मिलने से पहले घरेलू और औद्योगिक अपशिष्टों से बुरी तरह प्रदूषित हो जाती है। खतौली की यह परियोजना प्रदूषण भार को कम करने, जल गुणवत्ता में सुधार करने और स्रोत के निकट पारिस्थितिक बहाली में सहायता करने के लिए आर्द्रभूमि वनस्पति और प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं का सफलतापूर्वक उपयोग कर रही है।
एनएमसीजी की यह नई रणनीति इस बात का प्रमाण है कि प्रकृति के विरुद्ध कार्य करने के बजाय, उसके साथ तालमेल बिठाकर काम करने से ही हमारी नदियां फिर से स्वच्छ और निर्मल हो सकती हैं।
यह मॉडल भविष्य में देश भर की अन्य नदियों के संरक्षण प्रयासों के लिए एक उत्कृष्ट मार्गदर्शक साबित होगा।
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