Department of Commerce hosting a workshop on Trade and Sustainable Development in New Delhi.

नई दिल्ली: वाणिज्य विभाग की ‘व्यापार और सतत विकास’ पर विशेष कार्यशाला

नई दिल्ली: वाणिज्य विभाग द्वारा ‘व्यापार और सतत विकास नीति’ पर विशेष कार्यशाला का आयोजन”

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के वाणिज्य विभाग ने शनिवार को  नई दिल्ली स्थित वाणिज्य भवन में “व्यापार और सतत विकास (TSD): बदलता नीतिगत परिदृश्य” विषय पर एक दिवसीय महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन किया।

 

इस कार्यशाला में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सतत विकास के बदलते संबंधों पर गहन विचार-विमर्श किया गया।

इसमें वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, व्यापार वार्ताकारों, उद्योग जगत के जानकारों, शिक्षाविदों और कानूनी विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।

कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य

यह कार्यशाला प्रस्तावित परामर्श श्रृंखला की पहली कड़ी है। इसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक व्यापार नियमों में हो रहे बड़े बदलावों और जारी मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वार्ताओं के बीच व्यापार एवं सतत विकास (TSD) के प्रति भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण को और अधिक मजबूत बनाना है।

वाणिज्य सचिव का संबोधन और अहम सुझाव

प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए वाणिज्य सचिव श्री राजेश अग्रवाल ने कई अहम बिंदुओं पर प्रकाश डाला:

  • उन्होंने कहा कि व्यापार और सतत विकास (TSD) एक बहु-क्षेत्रीय विषय है, जिसके लिए व्यापार, उद्योग और प्रतिस्पर्धात्मकता को एक साथ जोड़ने वाला एकीकृत दृष्टिकोण जरूरी है।

  • सतत विकास से जुड़े नियम और पर्यावरणीय उपाय अब वैश्विक व्यापार व्यवस्था का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं।

  • उद्योगों को सतत विकास की प्रथाओं को अपनाने के लिए एक अनुकूल इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) विकसित करने की सख्त जरूरत है।

  • समय रहते इन उपायों को अपनाने से भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत होगी और देश बदलते अंतरराष्ट्रीय व्यापार परिदृश्य में बेहतर ढंग से अपनी भूमिका निभा सकेगा।

इन 4 मुख्य विषयों पर हुई चर्चा

कार्यशाला को चार विषयगत सत्रों में बांटा गया था। चर्चा का मुख्य केंद्र निम्नलिखित विषयों पर रहा:

  1. भारत का घरेलू कार्बन ढांचा और कार्बन बाजार।

  2. मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) में TSD संबंधी प्रावधानों की वैश्विक प्रवृत्तियां।

  3. कार्बन मूल्य निर्धारण तंत्र और कार्बन सीमा समायोजन उपाय।

  4. विकसित हो रहा वैश्विक कार्बन नियामक ढांचा और विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR)।

कार्यक्रम का समापन भारत की विकसित हो रही घरेलू सतत विकास व्यवस्था (जैसे कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना) पर चर्चा के साथ हुआ।

इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि उभरते व्यापारिक नियमों के लिए भारत की तैयारियों को मजबूत करने और भविष्य की व्यापार वार्ताओं को सही दिशा देने के लिए घरेलू पहलों का भरपूर लाभ उठाया जाए।