Devotees gathering for the holy dip at ancient Lolark Kund in Varanasi for Lolark Chhath festival

लोलार्क छठ: वाराणसी के प्राचीन कुंड में संतान प्राप्ति के लिए उमड़ी आस्था

लोलार्क छठ 2026: संतान प्राप्ति के लिए प्राचीन लोलार्क कुंड में आस्था की डुबकी, 10 राज्यों से उमड़े श्रद्धालु”

वाराणसी: दीपू हिन्दू की रिपोर्ट :  (THE POLITICS AGAIN)

काशी के भदैनी स्थित अति प्राचीन ‘लोलार्क कुंड’ में सूर्य उपासना और संतान प्राप्ति के महापर्व ‘लोलार्क छठ’ (लोलार्क षष्ठी) पर स्नान के लिए आस्था का जनसैलाब उमड़ पड़ा है।

17 सितंबर (गुरुवार) को होने वाले इस मुख्य स्नान के लिए बुधवार की मध्यरात्रि (12 बजे) से ही डुबकी लगाने का सिलसिला शुरू हो जाएगा।

संतान की कामना लिए 10 से अधिक राज्यों (दिल्ली, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि) के हजारों दंपती मंगलवार से ही कुंड के पास पहुंचने लगे हैं, जिससे सोनारपुरा से अस्सी मार्ग पर करीब 1 किलोमीटर लंबी कतार लग गई है।

सात साल बाद बने 7 महायोग, जानें स्नान का सर्वोत्तम मुहूर्त

ज्योतिषियों और मंदिर के महंत पं. अजय शंकर पांडेय के अनुसार, इस वर्ष सात साल बाद लोलार्क षष्ठी पर 7 महायोग बन रहे हैं, जिसमें ‘सर्वार्थ सिद्धि योग’ भी शामिल है। इससे पर्व का महत्व कई गुना बढ़ गया है।

  • तिथि: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि 16 सितंबर सुबह 8:55 बजे से 17 सितंबर सुबह 10:26 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के कारण 17 सितंबर को पर्व मनाया जा रहा है।

  • सर्वोत्तम मुहूर्त: 17 सितंबर सुबह 6:31 से 10:26 बजे तक स्नान और पूजा का सबसे उत्तम समय है।

  • बुधवार रात 11 बजे बाबा लोलार्केश्वर महादेव का रुद्राभिषेक होगा, जिसके बाद आधी रात से स्नान शुरू होकर अगले दिन रात तक चलेगा।

प्रशासन की चाक-चौबंद व्यवस्था, लक्खा मेले में एक लाख से ज्यादा भीड़ की उम्मीद

काशी के प्रसिद्ध ‘लक्खा मेलों’ (जहां लाखों की भीड़ जुटती है) में शुमार इस पर्व पर एक लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान है। प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं:

  • सोनारपुरा से अस्सी तक लगभग ढाई किलोमीटर क्षेत्र में बैरिकेडिंग की गई है।

  • लोलार्क कुंड से पांडेय हवेली तक डबल बैरिकेडिंग और धूप से बचाने के लिए कपड़े की छांव (टेंट) की व्यवस्था की गई है।

  • भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कुंड के पास ‘जिग-जैग’ बैरिकेडिंग और प्रवेश व निकासी के अलग-अलग द्वार बनाए गए हैं।

क्या है धार्मिक मान्यता और लोलार्क कुंड का इतिहास?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल षष्ठी के दिन भगवान सूर्यदेव के रथ का पहिया इसी स्थान पर गिरा था, जिसके कारण इस कुंड का नाम ‘लोलार्क’ पड़ा।

मान्यता है कि इस दिन जो दंपती (पति-पत्नी) एक साथ इस कुंड में स्नान कर विधिवत सूर्यदेव की उपासना करते हैं, उन्हें निश्चित ही संतान सुख की प्राप्ति होती है।

इसके अलावा, जिन लोगों की मन्नत पूरी हो जाती है, वे भी कृतज्ञता प्रकट करने और मन्नत उतारने यहां आते हैं।