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कुडनकुलम न्यूक्लियर प्लांट का डेटा लीक: क्या हैक हुआ सर्वर?

क्या हैक हो गया भारत का सबसे बड़ा न्यूक्लियर पावर प्लांट? डार्क वेब पर लीक हुईं 19,000 गुप्त फाइलें; जानें पूरी सच्चाई”

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट

भारत के सबसे बड़े न्यूक्लियर पावर प्लांट ‘कुडनकुलम’ (KKNPP) को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है।

इस बार चर्चा का विषय कोई तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि एक बड़ा साइबर हमला है जिसने देश के सामरिक इंफ्रास्ट्रक्चर की साइबर सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

दावा किया जा रहा है कि एक कुख्यात रैनसमवेयर समूह ने डार्क वेब पर कुडनकुलम प्लांट से जुड़ी लगभग 19,000 गुप्त फाइलें (करीब 14.3 GB डेटा) लीक कर दी हैं।

इस खबर के बाद से हड़कंप मचा हुआ है। तो क्या सच में भारत का न्यूक्लियर पावर प्लांट हैक हो गया है? आइए जानते हैं इस पूरे मामले की सच्चाई।

कैसे और कहां से चोरी हुआ डेटा?

सबसे पहले यह जान लेना जरूरी है कि यह डेटा सीधे NPCIL (न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया) के मुख्य सर्वर से चोरी नहीं हुआ है।

दरअसल, कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट की निर्माणाधीन यूनिट-3 और यूनिट-4 के कुछ इंफ्रास्ट्रक्चर का EPC कॉन्ट्रैक्ट साल 2018 में ‘रिलायंस इंफ्रा’ (Reliance Infra) को दिया गया था।

जानकारी के मुताबिक, सेंधमारी रिलायंस इंफ्रा के डेटा में हुई है। रिलायंस का यह डेटा भारतीय डेटा सेंटर कंपनी ‘योटा’ (Yotta) के सर्वर पर होस्ट था।

  • योटा के मुताबिक, 29 मई को उनके सर्वर पर संदिग्ध गतिविधियां दिखी थीं, जिसके बाद संभावित रैनसमवेयर को उसी समय रोक दिया गया था।

  • लेकिन जून के आखिर में रिलायंस ने सूचित किया कि बाहरी हमलावर डार्क वेब पर डेटा चोरी का दावा कर रहे हैं। रिलायंस ने भी स्वीकार किया है कि उसके डेटा में ‘आंशिक सेंधमारी’ (Partial Breach) हुई है।

‘वर्ल्ड लीक्स’ ने किया हमला, क्या-क्या हुआ लीक?

इस पूरे साइबर हमले के पीछे ‘वर्ल्ड लीक्स’ (World Leaks) नामक एक कुख्यात रैनसमवेयर गिरोह का हाथ बताया जा रहा है।

यह गिरोह पहले डेटा चुराता है, फिरौती मांगता है और पैसे न मिलने पर डेटा को डार्क वेब पर डाल देता है। इससे पहले यह गिरोह टाटा समूह जैसी बड़ी कंपनियों को भी निशाना बना चुका है।

साइबर सुरक्षा शोधकर्ताओं के अनुसार, लीक हुए इस 14.3 GB डेटा में साल 2016 से लेकर 2025 के मध्य तक की जानकारियां शामिल हैं:

  • यूनिट 3 और 4 की कूलिंग (शीतलन) और वेंटिलेशन प्रणालियों के इंजीनियरिंग ब्लूप्रिंट्स।

  • कॉमन कंट्रोल रूम के लेआउट प्लान।

  • भारतीय और रूसी इंजीनियरों के बीच हुई बैठकों का विवरण (Minutes) और संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट।

  • वेंडर्स की जानकारी और $112 मिलियन (11.2 करोड़ डॉलर) की संयुक्त आतंकवाद क्षतिपूर्ति बीमा (Joint terror indemnity policy) के दस्तावेज।

NPCIL का स्पष्टीकरण: ‘न्यूक्लियर सेफ्टी पर कोई असर नहीं’

इस लीक से मचे बवाल के बीच NPCIL ने आधिकारिक बयान जारी कर देशवासियों को आश्वस्त किया है।

कंपनी ने स्पष्ट किया कि लीक हुए दस्तावेज़ रिएक्टर सेफ्टी सिस्टम (मुख्य परमाणु प्रणाली) से बिल्कुल नहीं जुड़े हैं।

अधिकारियों ने बताया कि यह डेटा केवल निर्माणाधीन यूनिट 3 और 4 के ‘बैलेंस ऑफ़ प्लांट’ (BoP) यानी सामान्य सर्विस सुविधाओं (जैसे- बाहरी वेंटिलेशन, पानी की आपूर्ति नेटवर्क आदि) से संबंधित है।

मुख्य रिएक्टर सिस्टम (रूसी डिज़ाइन वाले VVER-1000) को कॉन्ट्रैक्टर के नेटवर्क से पूरी तरह अलग (Isolated) रखा गया है और वे इंटरनेट से नहीं जुड़े हैं।

थर्ड-पार्टी कॉन्ट्रैक्टर बन रहे बड़ी चुनौती

यह पहला मौका नहीं है जब कुडनकुलम प्लांट साइबर हमले के रडार पर आया है। साल 2019 में भी उत्तर कोरियाई हैकर्स (लाज़रस ग्रुप) के Dtrack मैलवेयर के जरिए एक एडमिनिस्ट्रेटिव कंप्यूटर में घुसपैठ की बात सामने आई थी।

हालिया घटना ने साबित कर दिया है कि भले ही मुख्य परमाणु संयंत्र सुरक्षित हों, लेकिन थर्ड-पार्टी कॉन्ट्रैक्टर्स और क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर्स साइबर सुरक्षा की सबसे ‘कमजोर कड़ी’ बन सकते हैं।

फिलहाल इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम (CERT-In) और न्यूक्लियर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स इस पूरे मामले की गहन जांच कर रहे हैं।

Santosh SETH

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