जानिये कैसा है हिमाचल के घुमंतू गुज्जरों का संघर्षपूर्ण जीवन 

“आज के आधुनिक समय मे व सूचना एवं प्रौद्योगिकी के इस दौर में बेशक कुछ लोग चांद तथा मंगल ग्रह पर घर बनाने का सपना देख रहे हों, मगर आधुनिकता की चकाचौंध से कोसों दूर अपने मवेशियों के साथ जंगल-जंगल घूम कर जीवन यापन करने वाले गुज्जर समुदाय के अधिकतर लोगों को आज भी बेघर होने पर खास मलाल नहीं है”
 
सिरमौर 09 / 10 / 2024 संतोष सेठ की रिपोर्ट 
 
इन दिनों गिरिपार के जंगलों में लगातार बारिश के चलते हल्की ठंड शुरू होने के बाद उक्त समुदाय के लोग मैदानी इलाकों के प्रवास पर निकल चुके हैं।
 
गिरिपार क्षेत्र मे अप्रैल महीने में इस समुदाय के लोग अपनी भैंस, गाय, बकरी व बैल आदि मवेशियों के साथ गर्मियां बिताने पहुंचते हैं।
 
अपने मवेशियों के साथ पैदल गंतव्य तक पहुंचने में इन्हे करीब एक माह का समय लग जाता है। इनके मवेशियों के सड़क से निकलने के दौरान वाहन चालकों को कईं बार जाम की समस्या से जूझना पड़ता है।
 
कईं चालकों को इन्हे बार-बार कोसते भी सुना जाता है। गुज्जरों की मानें तो वह सदियों से इन क्षेत्रों में घूम रहे हैं और तब सड़कें थी ही नही इसलिए सड़क पर उनका पहला हक है।
 
अगर गुज्जर समुदाय के इतिहास पर नजर दौडाई जाये तो गुज्जर छठी शताब्दी में मध्य एशिया से आई हूण जनजाति के वंशज है, जिन्हें पंजाब व मैदानी इलाकों के शासकों ने हिमाचल व कश्मीर के पहाड़ी इलाकों में खदेड़ दिया था।
 
इस समुदाय का सौशल मीडिया, सियासत, औपचारिक शिक्षा, इंटरनेट व एंड्रॉयड फोन आदि से नजदीक का नाता नहीं है। इसके बावजूद पिछले कुछ अरसे से गुज्जर समुदाय के कुछ लोग केवल बातचीत करने के लिए मौबाईल फोन का इस्तेमाल करने लगे हैं तथा इनके कुछ बच्चे स्कूल भी जाने लगे हैं।
 
गुज्जर समुदाय के अधिकतर परिवारों के पास अपनी जमीन अथवा घर पर नहीं है, हालांकि कुछ परिवारों को सरकार द्वारा पट्टे पर जमीन उपलब्ध करवाई गई है।
 
कुछ दशक पहले तक अनाज के बदले दूध देने वाले उक्त समुदाय के लोग अब अपने मवेशियों का दूध व खोया तथा घी पनीर आदि बेच कर अपना जीवन यापन करते हैं।
 
उक्त समुदाय के अधिकतर लोग खुद को मुस्लिम मानते है, हालांकि नमाज, रोजे व कुरान आदि के लिए इन्हें कभी वक्त नही मिला।
 
यहा क्षेत्र में यह एकमात्र घुमंतू समुदाय है तथा इनकी जनसंख्या मात्र दो हजार के करीब है। जंगलों में परिवार के साथ जिंदगी बिताने के दौरान न केवल उक्त समुदाय के लोगों के अनुसार उन्हें न केवल प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है, बल्कि कईं बार जंगली जानवरों, स्थानीय लोगों व संबंधित कर्मचारियों की बेरुखी का भी सामना करना पड़ता है।
 
पहाड़ों का ग्रीष्म कालीन प्रवास पूरा होने के बाद उक्त घुमंतू समुदाय अपने मवेशियों के साथ अब मैदानी इलाकों के अगले छह माह के प्रवास पर निकल चुका है और इसी तरह इनका पूरा जीवन बीत जाता है।
 
इस बारे में मीडिया ने इनके डेरे पर जाकर मंदार व इब्राहिम से इनके जीवन यापन व मुश्किलो के बारे में बातचीत की तो इन लोगो का कहना था कि एक दिन मे समुदाय अपने मवेशियों के साथ लगभग 20 से 25 कि मी का सफर कर सकते है।
 
इनके मवेशियों के सड़क से निकलने के दौरान वाहन चालकों को कईं बार जाम की समस्या से जूझना पड़ता है।