ndia 114 Rafale Deal

ऐतिहासिक रक्षा सौदा: 114 ‘राफेल’ उड़ाएंगे चीन-पाक की नींद

“साढ़े तीन लाख करोड़ का ‘मेगा डील’ बनेगा गेम चेंजर; ‘मेक इन इंडिया’ के तहत देश में ही बनेंगे 96 विमान”

विशेष संवाददाता | नई दिल्ली

सीमाओं पर जारी तनाव और बदलती वैश्विक भू-राजनीति के बीच भारत ने अपनी हवाई सुरक्षा को अभेद्य बनाने की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा कदम उठाया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “ताकत ही शांति की सबसे बड़ी गारंटी है” की नीति पर अमल करते हुए, भारत सरकार ने फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद की प्रक्रिया को निर्णायक मोड़ दे दिया है।

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की अध्यक्षता वाले रक्षा खरीद बोर्ड (DPB) ने इस महत्वाकांक्षी प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।

अनुमानित 3.5 लाख करोड़ रुपये का यह सौदा न केवल भारतीय वायुसेना (IAF) की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ाएगा, बल्कि भारतीय रक्षा विनिर्माण के इतिहास में एक नया अध्याय भी लिखेगा।

📊 एक नज़र में: सौदे का प्रभाव

विशेषता विवरण
सैन्य प्रभाव चीन और पाकिस्तान पर तकनीकी और सामरिक बढ़त।
औद्योगिक प्रभाव भारतीय एयरोस्पेस उद्योग को नई तकनीक और कौशल का लाभ।
रखरखाव एक ही प्लेटफॉर्म (राफेल) बड़ी संख्या में होने से रखरखाव आसान और सस्ता होगा।
नीति “ताकत ही शांति की गारंटी है” – पीएम मोदी की नीति का प्रतिबिंब।

 

मैक्रों के दौरे पर लग सकती है अंतिम मुहर

यह मंजूरी ऐसे समय में आई है जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा की तैयारियां जोरों पर हैं।

कूटनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि मूल्य वार्ता और अन्य औपचारिकताएं समय पर पूरी हो जाती हैं, तो दोनों देशों के बीच इस ऐतिहासिक ‘अंतर-सरकारी समझौते’ (G-to-G) पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं।

इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसी बिचौलिये की भूमिका नहीं होगी और सीधे फ्रांसीसी सरकार की गारंटी पर विमानों की आपूर्ति होगी।

प्रक्रिया के तहत, अब यह प्रस्ताव रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) के पास जाएगा और अंत में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट समिति (CCS) से इसे अंतिम स्वीकृति मिलेगी।

भारत अब खरीदार नहीं, निर्माता बनेगा: ‘मेक इन इंडिया’ को बड़ी उड़ान

इस सौदे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका ‘मेक इन इंडिया’ स्वरूप है। पुराने रक्षा सौदों से अलग, भारत ने इस बार शर्त रखी है कि वह केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं बल्कि निर्माता बनेगा।

  • 18 विमान: सीधे फ्रांस से उड़ान भरने योग्य (Fly-away) स्थिति में आएंगे।

  • 96 विमान: इनका निर्माण पूरी तरह भारत में होगा।

इसके लिए नागपुर स्थित डसॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस में अंतिम संयोजन लाइन स्थापित की जाएगी। इस महाअभियान में टाटा, महिंद्रा और डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज जैसी दिग्गज भारतीय कंपनियां साझीदार बनेंगी।

सौदे के तहत 55 से 60 प्रतिशत उपकरण और सामग्री स्वदेशी होगी, जिससे भारतीय एयरोस्पेस उद्योग को वैश्विक स्तर की तकनीक और कौशल प्राप्त होगा।

स्क्वाड्रन की कमी और ‘टू-फ्रंट वॉर’ की चुनौती

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, यह सौदा भारतीय वायुसेना के लिए ‘जीवनदान’ समान है। वर्तमान में वायुसेना के पास लड़ाकू विमानों की स्वीकृत 42 स्क्वाड्रन के मुकाबले केवल 29 स्क्वाड्रन ही बची हैं।

मिग-21 जैसे पुराने विमानों की विदाई और तेजस के उत्पादन में देरी ने एक वैक्यूम पैदा कर दिया था।

चीन और पाकिस्तान के साथ दोहरे मोर्चे (Two-Front War) की चुनौती और बांग्लादेश सीमा पर उभरती चिंताओं के बीच, राफेल जैसे 4.5+ पीढ़ी के विमानों की भारी संख्या में तैनाती दुश्मन के किसी भी दुस्साहस का जवाब देने के लिए अनिवार्य थी।

भविष्य की तकनीक: F-4 और F-5 वर्जन

भारत केवल मौजूदा राफेल नहीं खरीद रहा, बल्कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए राफेल के उन्नत F-4 और भविष्य के F-5 संस्करणों की मांग की है। इन विमानों में शामिल होंगे:

  • अत्याधुनिक एईएसए (AESA) रडार।

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित सहायता प्रणाली।

  • भारतीय हथियारों का एकीकरण: सभी विमानों को भारत में बनी मिसाइलों (जैसे अस्त्र) और हथियारों से लैस किया जाएगा।

सामरिक स्वायत्तता की ओर भारत

राफेल का यह सौदा केवल एक खरीद प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह भारत के संप्रभु संकल्प का प्रतीक है।

चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स (PLAAF) और पाकिस्तान वायुसेना के लिए यह एक स्पष्ट संदेश है कि भारत अब रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक निवारण (Aggressive Deterrence) की नीति पर चल पड़ा है।

रखरखाव की कम लागत और एक ही प्लेटफॉर्म की उपलब्धता से वायुसेना की परिचालन क्षमता (Operational Efficiency) अपने चरम पर होगी।

राफेल के पंखों पर सवार होकर भारत का यह संदेश साफ है—राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं होगा।

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