“राजनीति निरंतरता का खेल है, जहाँ एक जीत का जश्न अगली चुनौती की रणनीति में बदल जाता है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के लिए साल 2025 सिर्फ चुनावी कैलेंडर का एक पन्ना नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक पुनरुत्थान का एक नया अध्याय साबित हुआ है”
दिल्ली की सत्ता में एक दशक बाद वापसी और बिहार के जटिल सियासी मैदान में अपनी साख बचाए रखना, इस बात का प्रमाण है कि गठबंधन ने ‘प्रासंगिकता’ और ‘जनादेश’ के बीच का संतुलन बखूबी साध लिया है।
दिल्ली की जीत ने यह मिथक तोड़ दिया कि शहरी मतदाता केवल मुफ्त सुविधाओं के मोहपाश में बंधा है। यहाँ बीजेपी ने संगठन की मजबूती और ‘विकसित भारत’ के विजन को घर-घर पहुँचाया।
वहीं, बिहार में नीतीश कुमार के साथ मिलकर सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) को ‘प्रो-इंकंबेंसी’ में बदलना एनडीए के सहयोगी दलों के बीच बेहतर समन्वय की कहानी कहता है।
ये दोनों नतीजे विपक्ष के लिए एक चेतावनी हैं कि रणनीति केवल नारों से नहीं, बल्कि लाभार्थियों के साथ जमीनी जुड़ाव से बनती है।
सफलता के इस उत्साह के बीच, 2026 की चुनौतियां किसी हिमालयी चढ़ाई से कम नहीं हैं। पाँच राज्यों—असम, पश्चिम बंगाल, पुदुचेरी, तमिलनाडु और केरल में होने वाले चुनाव एनडीए की भविष्य की दिशा तय करेंगे।
असम और पुदुचेरी: यहाँ चुनौती ‘परफॉर्म या पेरिश’ (प्रदर्शन करो या बाहर हो) की है। सत्ता बचाने का दबाव अक्सर विकास की गति पर हावी हो जाता है, जिससे एनडीए को सतर्क रहना होगा।
पश्चिम बंगाल: ममता बनर्जी का किला ढहाने के लिए बीजेपी को केवल आक्रामक प्रचार नहीं, बल्कि हुमायूं कबीर जैसे असंतुष्टों द्वारा बनाए गए नए समीकरणों का चतुराई से लाभ उठाना होगा।
दक्षिण का द्वार (केरल और तमिलनाडु): अन्नामलाई की मेहनत और त्रिशूर में मिली लोकसभा जीत ने एनडीए के लिए दक्षिण भारत में ‘मनोवैज्ञानिक बढ़त’ तो बनाई है, लेकिन इसे ‘चुनावी जीत’ में बदलना अभी भी एक लंबी दूरी तय करने जैसा है। द्रविड़ राजनीति और वामपंथी विचारधारा के गढ़ में सेंध लगाने के लिए एनडीए को अपनी छवि ‘क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पोषक’ के रूप में और अधिक पुख्ता करनी होगी।
इतिहास गवाह है कि लोकसभा चुनाव से दो साल पहले होने वाले राज्य चुनाव राष्ट्रीय मूड का सूचकांक होते हैं। यदि एनडीए 2026 में अपने प्रदर्शन को दोहरा पाता है, तो 2029 की राह उसके लिए एक औपचारिकता मात्र रह जाएगी। लेकिन, अति-आत्मविश्वास से बचना ही इस गठबंधन की सबसे बड़ी जीत होगी।
2025 की जीत ने एनडीए को ‘मोमेंटम’ दिया है, लेकिन 2026 की जंग ‘अस्मिता’ और ‘विचारधारा’ की होगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या एनडीए उत्तर-पूर्व और उत्तर भारत की अपनी सफलता को दक्षिण और पूर्व के समुद्र तटीय राज्यों में अनुवादित कर पाएगा।
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