‘हर की पैड़ी पर गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित’ – गंगा सभा के बोर्ड और आधार कार्ड चेकिंग से गरमाया माहौल
“धर्मनगरी हरिद्वार के सबसे पवित्र स्थल ‘हर की पैड़ी’ पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर विवाद गहरा गया है। शुक्रवार को गंगा सभा द्वारा घाटों पर विवादित बोर्ड लगाए जाने के बाद से ही धार्मिक और राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है”
[हरिद्वार/देहरादून] | The Politics Again
इन बोर्डों पर स्पष्ट रूप से लिखा है—”हर की पैड़ी क्षेत्र में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है।” हालांकि, इसमें किसी संस्था का नाम नहीं है, लेकिन नीचे ‘आज्ञा से: म्युनिसिपल एक्ट हरिद्वार’ लिखा गया है, जिसने प्रशासन को भी असमंजस में डाल दिया है।
क्या है पूरा मामला?
आगामी कुंभ मेले की तैयारियों के बीच, गंगा सभा ने अपनी पुरानी मांग को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है। गंगा सभा के सदस्यों और तीर्थ पुरोहितों ने घाटों पर आने वाले संदिग्ध लोगों के आधार कार्ड चेक करने शुरू कर दिए हैं। उनका तर्क है कि हरिद्वार हिंदुओं का पवित्र तीर्थ स्थल है, पिकनिक स्पॉट नहीं।
ब्रितानी हुकूमत के नियमों का हवाला तीर्थ पुरोहितों का दावा है कि अंग्रेजों के शासनकाल में भी हर की पैड़ी पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर कानूनी रोक थी। उनका कहना है, “जब अंग्रेज शासक इसकी पवित्रता को समझते हुए रोक लगा सकते थे, तो हमारी अपनी सरकार इसे लागू करने में क्यों हिचक रही है?”
प्रशासन और सरकार का रुख इस पूरे प्रकरण पर विरोधाभास बना हुआ है।
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प्रशासन: गढ़वाल मंडल के कमिश्नर ने स्पष्ट किया है कि प्रशासन की तरफ से ऐसे बोर्ड लगाने का कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं हुआ है और उन्हें इसकी जानकारी नहीं है।
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सरकार: वहीं, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इशारों-इशारों में इस मांग का समर्थन किया है। उन्होंने कहा, “हरिद्वार देवभूमि का प्रवेश द्वार है। इसकी पवित्रता और स्वरूप की रक्षा करना हमारा दायित्व है।”
संतों और विरोधियों के बोल बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर आचार्य धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री ने भी इस मुहिम का समर्थन करते हुए कहा, “जिन्हें हिंदुत्व से परहेज है और जो गंगा को मां नहीं मानते, उनका हर की पैड़ी पर क्या काम?”
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने इसे संविधान विरोधी बताया है। सपा नेता एसटी हसन ने कहा कि भारत में किसी भी नागरिक को धर्म के आधार पर कहीं आने-जाने से नहीं रोका जा सकता। यह देश के सेक्युलर ढांचे पर हमला है।
रील्स और ‘फर्जी बाबाओं’ पर लगाम इस मांग के पीछे एक बड़ा कारण धार्मिक स्थलों पर बढ़ती अभद्रता भी है। रील बनाने वालों और साधु के वेश में घूमने वाले संदिग्ध लोगों (जिन्हें ‘फर्जी बाबा’ कहा जा रहा है) पर नकेल कसने के लिए इसे जरूरी कदम बताया जा रहा है। हालांकि, सवाल यह है कि क्या पवित्रता बचाने के लिए ‘पूर्ण प्रतिबंध’ ही एकमात्र रास्ता है?











