Politics

चुनाव विश्लेषण: अखिल भारतीय पार्टी बनी भाजपा, क्षेत्रीय क्षत्रप पस्त

चुनावी नतीजों का महा-विश्लेषण: ‘हिंदी बेल्ट’ का ठप्पा हटा, अखिल भारतीय पार्टी बनी भाजपा; क्षेत्रीय क्षत्रपों का दबदबा खत्म

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

पांच राज्यों—पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी—के विधानसभा चुनाव नतीजों ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा दोनों बदल दी है।

ये नतीजे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए एक बड़े ‘गेम-चेंजर’ साबित हुए हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा की ऐतिहासिक पहली जीत और असम तथा पुडुचेरी में सत्ता में वापसी ने पार्टी को अब सही मायने में एक ‘अखिल भारतीय पार्टी’ (Pan-India Party) के रूप में स्थापित कर दिया है।

इन नतीजों ने जहां एक ओर ममता बनर्जी और एमके स्टालिन जैसे कद्दावर नेताओं की हार से क्षेत्रीय क्षत्रपों की मुखर आवाज को कुंद कर दिया है, वहीं तमिलनाडु में ‘टीवीके’ (TVK) के उभार ने भाजपा के लिए नए राजनीतिक विकल्प खोल दिए हैं।

आइए समझते हैं कि इन नतीजों का भाजपा और देश की भविष्य की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा:

1. ‘हिंदी बेल्ट’ की पार्टी का ठप्पा हमेशा के लिए खत्म

लंबे समय तक भाजपा को केवल उत्तर भारत या ‘हिंदी बेल्ट’ की पार्टी माना जाता था। लेकिन बंगाल में प्रचंड जीत और असम में लगातार तीसरी बार सत्ता बरकरार रखने ने इस धारणा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

पश्चिम भारत को जीतने के बाद अब बंगाल के अजेय गढ़ पर कब्जा करके भाजपा ने पूर्वी भारत में अपनी गहरी पैठ बना ली है।

यह जीत इस वैचारिक दावे को भी मजबूती देती है कि भारतीय सभ्यता एक ही इकाई है। खुद को सिर्फ हिंदू, हिंदी और आक्रामक राजनीति तक सीमित मानने वाली सोच को पार्टी ने इन नतीजों से पीछे छोड़ दिया है।

2. राज्यसभा में आसान होगी राह, 2029 के लिए मजबूत आधार

द्रमुक (DMK) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) जैसी बड़ी विपक्षी पार्टियों की हार ने विपक्ष को राष्ट्रीय स्तर पर काफी कमजोर कर दिया है।

पश्चिम बंगाल की यह महाविजय राज्यसभा में भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल करने में सबसे बड़ी मददगार साबित होगी।

ऐतिहासिक रूप से बंगाल में सत्ताधारी दल को लोकसभा में भी बढ़त मिलती रही है। ऐसे में 2029 के आम चुनाव के लिए भाजपा की राह काफी आसान हो गई है।

अब पार्टी यह दावा कर सकती है कि उसकी अपील देश के विभिन्न क्षेत्रों और संस्कृतियों तक फैली हुई है।

3. क्षेत्रीय क्षत्रपों के युग का अवसान

भारतीय राजनीति में यह चुनाव क्षेत्रीय क्षत्रपों के पतन का गवाह बना है। भाजपा ने लगभग उन सभी क्षेत्रीय नेताओं को खत्म या बेहद कमजोर कर दिया है, जो भविष्य में उसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती बन सकते थे।

शरद पवार, अरविंद केजरीवाल, नीतीश कुमार और नवीन पटनायक के प्रभाव के फीका पड़ने के बाद अब ममता बनर्जी, एमके स्टालिन और पिनराई विजयन की करारी हार ने विपक्षी एकता की कमर तोड़ दी है।

4. तमिलनाडु में चौका सकती है पार्टी: TVK के साथ गठबंधन के संकेत?

दक्षिण के सबसे अहम राज्य तमिलनाडु में अभिनेता विजय की पार्टी ‘टीवीके’ (TVK) की जीत ने सियासी समीकरण दिलचस्प बना दिए हैं।

सूत्रों का कहना है कि भाजपा ने आखिरी मिनट तक बातचीत का रास्ता खुला रखा था। चूंकि टीवीके अकेले दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है, इसलिए भाजपा दोस्ती का हाथ बढ़ा सकती है और राज्य की सत्ता में भागीदारी का विकल्प खुला रख सकती है।

5. दक्षिण में संघर्ष जारी, लेकिन 80% आबादी पर अब NDA का राज

दक्षिण के दो बड़े राज्य—केरल और तमिलनाडु—भले ही अभी भी भाजपा के पूर्ण नियंत्रण से बाहर हों, लेकिन इन नतीजों के बाद अब देश की करीब 78% से 80% आबादी भाजपा या एनडीए शासित राज्यों में रह रही है।

दक्षिण में भाजपा के प्रदर्शन को खराब कहना जल्दबाजी होगी। पार्टी ने केरल में ऐतिहासिक रूप से 3 सीटें जीतकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है।

हालांकि, तमिलनाडु में केवल 1 सीट पर जीत निराशाजनक है, जो इस क्षेत्र में हिंदुत्व के संदेश की सीमाएं उजागर करती है।

6. पुदुचेरी ने दिया एनडीए को सहारा और स्थिरता

दक्षिण भारत में यूं तो आंध्र प्रदेश में एनडीए सरकार है, लेकिन इस बार पुडुचेरी ने भी गठबंधन को बड़ा सहारा दिया है।

पुडुचेरी का राजनीतिक इतिहास हमेशा से अस्थिर रहा है, जहां सरकारें गिरती रही हैं। लेकिन एआईएनआर कांग्रेस (AINRC) के एनडीए में आने के बाद वहां राजनीतिक स्थिरता आई है। इस चुनाव में भाजपा की दो सीटें कम होने का सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

Santosh SETH

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