अल नीनो और सूखे के कारण फटी हुई खेत की जमीन पर मायूस बैठा एक भारतीय किसान और महंगाई का प्रतीकात्मक ग्राफ

अल नीनो का खतरा: मानसून में देरी से महंगाई और कृषि संकट की चेतावनी

अल नीनो का साया: मानसून की देरी से गहराया आर्थिक संकट, RBI की बढ़ी चिंता, खाने-पीने की चीजों में लगेगी आग!

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

करोड़ों भारतीयों के लिए कभी बारिश कागज़ की नावें तैराने और पकौड़ियों के साथ सुकून भरी शाम बिताने का मौसम हुआ करती थी।

लेकिन आज, मानसून का आगमन ‘सुकून’ नहीं बल्कि ‘चिंता’ का विषय बन गया है। भारत इस समय एक ऐसे आर्थिक और मौसमी ‘तूफान’ में फंसा हुआ है जहां मानसून की देरी और प्रशांत महासागर में बन रहे ‘अल नीनो’ (El Nino) के खतरे ने आम जनता से लेकर रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) तक की नींद उड़ा दी है।

यह संकट सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर आपके किचन के बजट, महंगाई दर और देश की समग्र अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला है।

क्या है ‘अल नीनो’ और भारत के लिए क्यों है यह खतरनाक?

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से काफी गर्म हो जाता है।

इसके कारण पूरी दुनिया का वायुमंडलीय चक्र गड़बड़ा जाता है। भारत के संदर्भ में, इतिहास गवाह है कि अल नीनो का सीधा मतलब कमजोर मानसून और सूखा होता है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) का अनुमान है कि जून-अगस्त के बीच अल नीनो बनने की संभावना 80% से 90% तक है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने भी 2026 के लिए बारिश का अनुमान घटाकर ‘लॉन्ग पीरियड एवरेज’ (LPA) का 92% कर दिया है, जो साल 2002 के बाद सबसे कम है।

मानसून की सुस्त चाल: कृषि व्यवस्था पर चौतरफा मार

भारत की लगभग आधी कृषि भूमि आज भी सिंचाई के लिए बारिश पर निर्भर है। मानसून की सुस्त चाल ने खरीफ सीजन (Kharif Season) की फसलों को बुरी तरह प्रभावित किया है:

  • बारिश में भारी कमी: 4 जून से 18 जून के बीच देश में सामान्य (72.2 मिमी) के मुकाबले सिर्फ 42.6 मिमी बारिश हुई है, जो 41% की भारी कमी को दर्शाता है। मध्य भारत में यह कमी 67% तक है।

  • बुवाई में गिरावट: 12 जून तक खरीफ फसलों का बुवाई क्षेत्र 84.6 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 3.9% कम है। सबसे बुरी मार दालों (-43.2%) और कपास (-28%) पर पड़ी है।

  • किसानों पर दोहरा दबाव: बारिश न होने से किसानों को डीजल और बिजली के पंपों से सिंचाई करनी पड़ रही है, जिससे खेती की लागत बढ़ रही है और कमाई घट रही है।

महंगाई का डंक: टमाटर, प्याज और रोजमर्रा का सामान होगा महंगा

कमजोर मानसून और अल नीनो का सबसे डरावना रूप महंगाई (Inflation) के तौर पर सामने आ रहा है।

  • RBI का बदला अनुमान: इन जोखिमों को देखते हुए RBI ने वित्त वर्ष 2027 के लिए महंगाई का अनुमान 4.6% से बढ़ाकर 5.1% कर दिया है।

  • खाने-पीने की चीजों में आग: SBI रिसर्च और अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, अल नीनो के कारण टमाटर की कीमतों में सबसे जबरदस्त उछाल आएगा। भीषण गर्मी और मानसून की बेरुखी से फल, सब्जियां, खाने का तेल और मसालों की कीमतें पहले ही आसमान छूने लगी हैं।

  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर चोट: ग्रामीण आय घटने से ट्रैक्टरों की बिक्री से लेकर पर्सनल केयर (साबुन, शैंपू आदि) कंपनियों के राजस्व में भारी गिरावट आने की आशंका है।

क्या भारत अब सूखे से निपटने के लिए तैयार है?

राहत की बात यह है कि एक दशक पहले की तुलना में भारत अब सूखे से निपटने के लिए बेहतर स्थिति में है।

  1. सिंचाई नेटवर्क: बार्कलेज (Barclays) के अनुसार, 2010-11 में भारत का 40% सिंचित क्षेत्र था, जो अब बढ़कर 55% हो गया है।

  2. जलाशयों का बेहतर स्तर: पिछले साल की अच्छी बारिश के कारण देश के जलाशयों (Dams) में उनके 10 साल के औसत से 16% से 29% तक ज्यादा पानी मौजूद है, जो सिंचाई के लिए एक मजबूत ढाल का काम करेगा।

निष्कर्ष: अल नीनो केवल प्रशांत महासागर के गर्म होने की घटना नहीं है। यह भारत के लिए दूध, टमाटर और बिजली की कीमतों से लेकर आर्थिक विकास दर तक को प्रभावित करने वाला एक बड़ा फैक्टर है।

अब सभी की निगाहें जुलाई और अगस्त की बारिश पर टिकी हैं। अगर बादल नहीं बरसे, तो इसके आर्थिक नतीजे बादलों से कहीं आगे तक जाएंगे।