टीएमसी में नाम और चुनाव चिह्न को लेकर घमासान, पुलिस में शिकायत दर्ज
टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न पर घमासान: पुलिस में दो शिकायतें दर्ज, 21 जुलाई की रैली को लेकर भी बढ़ा सियासी संग्राम”
कोलकाता: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद अब और गहरा गया है।
पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान अब कानूनी मोड़ ले चुकी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले कालीघाट समर्थक गुट ने ऋतब्रत बंद्योपाध्याय गुट पर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न के कथित अवैध इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए कोलकाता पुलिस में दो अलग-अलग शिकायतें दर्ज कराई हैं।
शिकायतों में जालसाजी, धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश, भ्रामक जानकारी फैलाने तथा पार्टी के महत्वपूर्ण दस्तावेजों के कथित दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
यह शिकायतें कोलकाता पुलिस के कालीघाट और साल्टलेक थानों में दर्ज कराई गई हैं। मामले के सामने आने के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है।
विपक्ष के मुख्य सचेतक का बयान
पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के मुख्य सचेतक अखरुज्जामान ने कहा कि कानून अपना काम करेगा और समय आने पर सभी तथ्यों का खुलासा होगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग राजनीतिक दल बनाने की कानूनी प्रक्रिया को समझे बिना बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के समक्ष जमा किए गए दस्तावेजों की सत्यता भी जल्द स्पष्ट हो जाएगी और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ है तो संबंधित एजेंसियां आवश्यक कार्रवाई करेंगी।
21 जुलाई की शहीद दिवस रैली पर भी बढ़ा विवाद
टीएमसी के भीतर जारी विवाद का असर अब 21 जुलाई को प्रस्तावित शहीद दिवस कार्यक्रम पर भी दिखाई देने लगा है।
कालीघाट समर्थक गुट ने धर्मतला स्थित विक्टोरिया हाउस के सामने सभा आयोजित करने की अनुमति के लिए कोलकाता पुलिस को आवेदन दिया है।
दूसरी ओर, इस रैली को लेकर दायर जनहित याचिका तथा कलकत्ता हाईकोर्ट की ओर से जारी नोटिस के बाद राजनीतिक माहौल और अधिक गरमा गया है। अब सभी पक्षों की निगाहें न्यायालय और प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।
चुनाव आयोग और अदालत पर टिकी निगाहें
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद अब केवल संगठनात्मक नेतृत्व तक सीमित नहीं रहा है।
मामला पार्टी के आधिकारिक नाम, चुनाव चिह्न, संगठनात्मक वैधता और कानूनी अधिकारों तक पहुंच चुका है।
यदि विवाद चुनाव आयोग तक पहुंचता है, तो आयोग को उपलब्ध दस्तावेजों, पार्टी संविधान और संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर निर्णय लेना पड़ सकता है।
वहीं अदालत में लंबित मामलों का असर भी आगामी राजनीतिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में पुलिस जांच, चुनाव आयोग की प्रक्रिया और अदालत की सुनवाई इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी।
साथ ही 21 जुलाई के कार्यक्रम को लेकर प्रशासनिक अनुमति और न्यायिक फैसले पर भी राजनीतिक दलों की नजर बनी हुई है।











