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बंगाल : जमीन नहीं मिलने से कैसे बढ़ती रहीं बीएसएफ की मुश्किलें

बंगाल में नई सरकार का बड़ा एक्शन: 45 दिन में BSF को जमीन सौंपने का आदेश, अब पूरी तरह सील होगी भारत-बांग्लादेश सीमा”

कोलकाता/नई दिल्ली: द  पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

भारत-बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ और तस्करी को पूरी तरह से खत्म करने के लिए पश्चिम बंगाल की नई भाजपा सरकार ने एक बड़ा और कड़ा कदम उठाया है।

राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए राज्य सरकार ने प्रशासन को स्पष्ट आदेश दिया है कि सीमा पर फेंसिंग (कंटीले तार) के लिए लंबित जमीन का अधिग्रहण कर 45 दिनों के भीतर उसे सीमा सुरक्षा बल (BSF) को सौंप दिया जाए।

वर्षों से जमीन हस्तांतरण में हो रही देरी के कारण पश्चिम बंगाल में कई जगहों पर सीमा खुली हुई थी, जिसका सीधा फायदा घुसपैठियों और तस्करों को मिल रहा था।

क्यों रुकी हुई थी फेंसिंग और क्या थी चुनौती?

भारत-बांग्लादेश सीमा पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक संवेदनशील मानी जाती है। राज्य के कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, उत्तर व दक्षिण दिनाजपुर, मालदह, मुर्शिदाबाद, नदिया और उत्तर 24 परगना जिलों में अंतरराष्ट्रीय सीमा घनी आबादी, खेतों और नदियों के बीच से होकर गुजरती है।

कई जगहों पर लोगों के घर और बाजार सीमा के बेहद करीब हैं। ऐसे में फेंसिंग के लिए स्थानीय सहमति और जमीन अधिग्रहण हमेशा से एक बड़ी चुनौती बनी रही।

जमीन न मिलने से BSF को हो रही थीं ये 7 बड़ी परेशानियां:

  1. अधूरी फेंसिंग: सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, करीब 127 किलोमीटर सीमा क्षेत्र में फेंसिंग के लिए जमीन ही उपलब्ध नहीं थी। इससे सीमा बीच-बीच में टूटी रही और ‘असुरक्षित’ बनी रही।

  2. घुसपैठ का आसान रास्ता: फेंसिंग न होने से रात के अंधेरे में खेतों और नदी किनारों से घुसपैठिए आसानी से भारत में प्रवेश कर स्थानीय आबादी में घुल-मिल जाते थे।

  3. जवानों पर भारी दबाव: जहां कंटीले तार और फ्लडलाइट नहीं होते, वहां निगरानी के लिए BSF को लगातार पैदल गश्त करनी पड़ती थी, जिससे मानव बल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता था।

  4. नदियों और ‘चर’ क्षेत्रों में दिक्कत: मालदह और मुर्शिदाबाद में गंगा व अन्य नदियों के कारण भौगोलिक बदलाव होते रहते हैं। जमीन न मिलने से यहां स्थायी फेंसिंग संभव नहीं थी।

  5. तस्करी का खुला खेल: अधूरी फेंसिंग का फायदा उठाकर तस्कर आसानी से मवेशी, नकली मुद्रा और नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए रास्ते बदल लेते थे।

  6. रात की निगरानी कमजोर: जमीन न मिलने के कारण सीमा पर सड़कें और प्रकाश व्यवस्था (Floodlights) नहीं बन पाईं, जिससे रात में घुसपैठ रोकना बेहद कठिन था।

  7. स्थानीय विवाद: ग्रामीणों को डर था कि फेंसिंग से उनकी खेती सीमा के उस पार चली जाएगी। इसी विवाद में प्रशासनिक प्रक्रिया वर्षों तक लंबित रही।

356 एकड़ जमीन हस्तांतरण से बदलेगी तस्वीर

वर्ष 2025 में ही मालदह, मुर्शिदाबाद, उत्तर 24 परगना और कूचबिहार जिलों के डीएम को करीब 356 एकड़ जमीन BSF को देने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए गए थे।

अब राज्य की नई सरकार ने इस प्रक्रिया को ‘टॉप गियर’ में डालते हुए 45 दिन का अल्टीमेटम दे दिया है।

क्या होगा सीधा असर?

अगर तय समय में बीएसएफ को पूरी जमीन मिल जाती है, तो पूरी सीमा पर लगातार फेंसिंग हो सकेगी।

सीमा पर फ्लडलाइट और सड़कों का निर्माण तेज होगा। इसके अलावा, आधुनिक निगरानी तकनीक (सेंसर आदि) का इस्तेमाल कर घुसपैठ और तस्करी पर स्थायी रूप से लगाम लगाई जा सकेगी।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अधूरी सीमा को पूरी तरह से सील करना राष्ट्रीय सुरक्षा की दिशा में एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ साबित होगा।

Santosh SETH

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