पूर्वांचल / वाराणसी

बंगाल चुनाव: ममता के ‘वोट बैंक’ में ओवैसी-कबीर की सेंध

बंगाल पॉलिटिक्स ब्रेकिंग: ममता बनर्जी के ‘खेला होबे’ में ओवैसी की एंट्री… हुमायूं कबीर की पार्टी के साथ किया गठबंधन, 149 सीटों पर लड़ेंगे चुनाव… TMC के मजबूत ‘मुस्लिम वोट बैंक’ में सेंधमारी का खतरा… कांग्रेस ने ओवैसी को बताया ‘BJP की बी-टीम’… पढ़ें ‘The Politics Again’ की विस्तृत रिपोर्ट…


पश्चिम बंगाल चुनाव: ओवैसी और हुमायूं कबीर के गठजोड़ से ‘खेला होबे’ में नया ट्विस्ट, क्या दरकेगा ममता बनर्जी का मजबूत वोट बैंक?

कोलकाता | पॉलिटिकल डेस्क, संतोष सेठ की रिपोर्ट The Politics Again

पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है और आगामी विधानसभा चुनावों के ‘खेल’ के मैदान में एक नया राजनीतिक मोर्चा उतर चुका है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अक्सर ‘खेला होबे’ का नारा लगाकर विरोधियों पर निशाना साधती हैं, लेकिन इस बार असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM) और हुमायूं कबीर की ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ के नए गठजोड़ ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की नींद उड़ा दी है।

यह गठबंधन सीधे तौर पर TMC के उस मजबूत वोट बैंक को चुनौती दे रहा है, जिस पर 2011 से ममता बनर्जी का अटूट नियंत्रण माना जाता रहा है।

TMC के लिए क्यों है यह खतरे की घंटी?

ओवैसी और कबीर का यह ऐलान ऐसे समय आया है जब तृणमूल कांग्रेस पहले से ही मतदाता सूची के पुनरीक्षण और संदिग्ध नामों को हटाए जाने की कार्रवाई से दबाव में है।

  • मुस्लिम वोट बैंक में बंटवारा: 2011 से मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा TMC के साथ मजबूती से खड़ा रहा है, जो ममता की सबसे बड़ी ताकत है। अब ओवैसी और कबीर खुद को इस समुदाय की आवाज के रूप में पेश कर रहे हैं। अगर यह वोट बैंक बंटता है, तो चुनाव परिणाम पूरी तरह पलट सकते हैं।

  • हुमायूं कबीर का प्रभाव: कभी ममता बनर्जी के करीबी रहे हुमायूं कबीर की मुर्शिदाबाद और आसपास के इलाकों में मजबूत पकड़ है। 149 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की उनकी घोषणा यह साफ संकेत देती है कि उनका इरादा केवल अपनी मौजूदगी दर्ज कराना नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल को सीधी टक्कर देना है।

कांग्रेस का तीखा हमला: ओवैसी को बताया ‘BJP का सहयोगी’

इस नए गठबंधन पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस का आरोप है कि ओवैसी का मकसद केवल वोटों का बंटवारा करना है, जिससे सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी (BJP) को पहुंचे।

हालांकि, पश्चिम बंगाल में वाम दल और कांग्रेस के बीच भी सीट बंटवारे को लेकर फिलहाल एकजुट विपक्ष की तस्वीर अधूरी है, जो इस बिखराव को और गहरा कर रही है।

भाषाई पहचान की चुनौती

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस गठजोड़ के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाषाई और क्षेत्रीय पहचान की होगी। पश्चिम बंगाल के अधिकांश मुस्लिम मतदाता बांग्ला भाषी हैं, जबकि ओवैसी की पहचान मुख्य रूप से उर्दू भाषी राजनीति से जुड़ी रही है।

हालांकि, कबीर जैसे स्थानीय चेहरों के सहारे इस मोर्चे ने एक मजबूत विकल्प बनने की ताल ठोक दी है।

अब नजर इस बात पर है कि क्या यह नया समीकरण केवल चुनावी शोर बनकर रह जाएगा या सच में पश्चिम बंगाल की सत्ता के समीकरणों को पूरी तरह बदल देगा।

Santosh SETH

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