जौनपुर में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों का प्रचार और जनसभाएं

विधानसभा चुनाव 2027 : जौनपुर की राजनीतिक खिचड़ी !

विधानसभा चुनाव 2027: जौनपुर की सभी 9 सीटों पर ‘सत्ता का महासंग्राम’, लोकसभा के नतीजों से सपा का ‘जोश हाई’, तो भाजपा कर रही ‘डैमेज कंट्रोल’

जौनपुर : THE POLITICS AGAIN डेस्क (पॉलिटिकल रिपोर्ट): संतोष सेठ की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में 2027 के विधानसभा चुनावों की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही पूर्वांचल के अहम जिले जौनपुर (Jaunpur) में भी सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं।

जौनपुर जिले की सभी नौ विधानसभा सीटों— जौनपुर सदर, मल्हनी, शाहगंज, मुंगरा बादशाहपुर, मछलीशहर, मड़ियाहूं, जफराबाद, बदलापुर और केराकत—पर राजनीतिक दलों ने अपनी गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं।

हाल ही में हुए 2024 के लोकसभा चुनावों में जौनपुर सीट पर समाजवादी पार्टी (SP) के बाबू सिंह कुशवाहा की बड़ी जीत ने सूबे और जिले के सियासी समीकरणों को पूरी तरह से पलट कर रख दिया है।

इस जीत ने जहां सपा के खेमे में नई ऊर्जा भर दी है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) को अपनी जमीनी रणनीति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।

आइए समझते हैं कि जौनपुर की हर विधानसभा सीट पर 2027 को लेकर क्या पक रही है राजनीतिक खिचड़ी?

समाजवादी पार्टी (SP): ‘PDA’ के सहारे क्लीन स्वीप की तैयारी

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव जौनपुर में अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को और अधिक धार दे रहे हैं।

2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने जौनपुर में शानदार प्रदर्शन किया था और अब 2027 में वे इसे और बेहतर करना चाहते हैं।

  • मल्हनी और शाहगंज पर फोकस: मल्हनी विधानसभा सीट, जिसे समाजवादी पार्टी और विशेष रूप से स्व. पारसनाथ यादव के परिवार (अब लकी यादव) का मजबूत गढ़ माना जाता है, वहां पार्टी अपनी पकड़ को और मजबूत कर रही है।

  • वहीं, शाहगंज सीट पर दो बार के पूर्व विधायक शैलेंद्र यादव ‘ललई’ फिर से जमीन तैयार कर रहे हैं, ताकि 2022 की मामूली हार (निषाद पार्टी के रमेश सिंह से) का बदला लिया जा सके।

  • सोशल इंजीनियरिंग: सपा का मुख्य जोर यादव और मुस्लिम वोट बैंक को इंटैक्ट रखते हुए, गैर-यादव ओबीसी (OBC) और दलित वोटरों को अपने पाले में लाने पर है।

  • लोकसभा चुनाव में ब्राह्मण और मुस्लिम मतदाताओं के एक बड़े वर्ग का सपा की ओर झुकाव पार्टी के लिए एक सकारात्मक संकेत रहा है।

भारतीय जनता पार्टी (BJP): ‘डैमेज कंट्रोल’ और हिंदुत्व का दांव

2024 के लोकसभा चुनाव में जौनपुर में मिली करारी हार के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) हाई अलर्ट पर है। पार्टी ने 2027 के लिए सूक्ष्म प्रबंधन (Micro-management) शुरू कर दिया है।

  • भितरघात पर लगाम: भाजपा का सबसे बड़ा फोकस उन कमियों को दूर करना है जिनके कारण लोकसभा चुनाव में उसे नुकसान उठाना पड़ा। पार्टी अपने रूठे हुए स्थानीय नेताओं, विशेषकर राजपूत और ब्राह्मण क्षत्रपों को मनाने में जुटी है।

  • जौनपुर सदर और बदलापुर: जौनपुर सदर सीट से वर्तमान भाजपा विधायक और मंत्री गिरीश चंद्र यादव अपने विकास कार्यों के दम पर फिर से जनता के बीच जा रहे हैं।

  • बदलापुर और जफराबाद जैसी सीटों पर पार्टी हिंदुत्व, सीएम योगी के ‘लॉ एंड ऑर्डर’ मॉडल और केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं (फ्री राशन, आवास) को अपना मुख्य हथियार बना रही है।

बहुजन समाज पार्टी (BSP) का अस्तित्व संकट और ‘निर्णायक वोट’

बहुजन समाज पार्टी (BSP) के लिए जौनपुर में लड़ाई अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की है। लोकसभा चुनाव में धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला रेड्डी (Shrikala Reddy) को टिकट देकर बसपा ने चुनाव को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश की थी, लेकिन बाद में टिकट बदलने से पार्टी का कोर वोटर भ्रमित हो गया।

2027 के लिए मायावती का जोर अपने पारंपरिक  वोट बैंक को सहेजने और उसे किसी भी कीमत पर सपा या कांग्रेस की तरफ छिटकने से रोकने पर है।

मुंगरा बादशाहपुर और मछलीशहर जैसी सुरक्षित सीटों पर बसपा मजबूत प्रत्याशी उतारने की रणनीति बना रही है।

‘बाहुबली’ धनंजय सिंह का फैक्टर: कौन सा पासा फेंकेंगे?

जौनपुर की राजनीति में पूर्व सांसद और बाहुबली नेता धनंजय सिंह (Dhananjay Singh) की भूमिका को कभी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से मल्हनी (पूर्व में रारी) विधानसभा क्षेत्र में उनका व्यक्तिगत प्रभाव बहुत गहरा है।

  • कानूनी अड़चनों और जेल से बाहर आने के बाद, धनंजय सिंह 2027 के विधानसभा चुनाव में ‘किंगमेकर’ या खुद एक बड़े दावेदार के रूप में उभर सकते हैं।

  • अगर वे या उनके परिवार का कोई सदस्य (जैसे उनकी पत्नी श्रीकला) निर्दलीय या किसी प्रमुख दल के समर्थन से मैदान में उतरते हैं, तो मल्हनी और आसपास की 2-3 सीटों के समीकरण पूरी तरह से बदल जाएंगे।

निष्कर्ष

जौनपुर की नौ विधानसभा सीटों का चुनाव 2027 में केवल राजनीतिक दलों का शक्ति परीक्षण नहीं होगा, बल्कि यह जातीय गोलबंदी और बाहुबलियों के व्यक्तिगत वर्चस्व की भी बड़ी परीक्षा होगी।

सपा अपने जीत के मोमेंटम को बनाए रखना चाहती है, जबकि भाजपा अपनी खोई हुई साख वापस पाने के लिए बेताब है।

आने वाले समय में टिकट बंटवारे से लेकर गठबंधन (सुभासपा, निषाद पार्टी, अपना दल) के खेल तक, जौनपुर की सियासी बिसात अभी और उलझेगी और दिलचस्प होगी।

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