एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस : शिवराज बोले- ‘अन्नदाता’ अब बनेंगे ‘ऊर्जादाता’
‘अन्नदाता’ अब बनेंगे ‘ऊर्जादाता’: भारत मंडपम में 7वें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस का भव्य शुभारंभ, खेती और सौर ऊर्जा के संगम पर जोर”
नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
राजधानी के भारत मंडपम में बुधवार को तीन दिवसीय ‘7वें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस’ का शानदार आगाज हुआ।
सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य कृषि और सौर ऊर्जा के एकीकरण को बढ़ावा देना है, ताकि किसान फसल उगाने के साथ-साथ बिजली का उत्पादन भी कर सकें।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री श्री प्रह्लाद जोशी ने इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ किया।
इस मॉडल का मूल मंत्र है- ‘ऊपर सोलर पैनल, नीचे लहलहाएगी फसल’।
‘रहिमन पानी राखिये’ की तर्ज पर अब ‘रहिमन बिजली राखिये’
उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश का किसान अब केवल “अन्नदाता” नहीं, बल्कि “ऊर्जादाता” भी बनने जा रहा है।
उन्होंने इस तकनीक को “आम के आम और गुठलियों के दाम” और “हिंग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा” जैसी देसी कहावतों से परिभाषित किया।
आधुनिक युग में बिजली की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि बिना बिजली के खेती शून्य है, इसलिए खेती के साथ ऊर्जा उत्पादन को जोड़ना किसानों के हित में सबसे बड़ा कदम है।
छोटे किसानों के लिए व्यावहारिक नीति की आवश्यकता
श्री चौहान ने स्पष्ट किया कि भारत में औसत भूमि जोत मात्र 0.96 हेक्टेयर है और 85 प्रतिशत किसान छोटे व सीमांत हैं।
किसान खेती छोड़कर केवल सोलर प्लांट नहीं लगा सकते, इसलिए एग्रीवोल्टाइक नीतियां जमीनी हकीकत के अनुकूल होनी चाहिए। उन्होंने नीति-निर्माताओं को निम्नलिखित व्यावहारिक सुझाव दिए:
-
पैनल की ऊंचाई और दूरी: पैनलों की ऊंचाई और खंभों के बीच की दूरी ऐसी हो जिससे ट्रैक्टर से जुताई में बाधा न आए और किसान अपनी पसंद की फसल व फसल-चक्र चुन सकें।
-
जल प्रबंधन: पैनलों से गिरने वाले बारिश के पानी के सुरक्षित निकास की व्यवस्था हो, ताकि मिट्टी का कटाव न हो।
-
पारदर्शी भुगतान व रखरखाव: ग्रिड तक पहुंच और पारदर्शी भुगतान सुनिश्चित किया जाए। उपकरणों के रखरखाव के लिए स्थानीय युवाओं और महिलाओं को प्रशिक्षित कर रोजगार के अवसर बनाए जाएं।
-
किसानों पर वित्तीय बोझ नहीं: यदि कोई कंपनी बीच में अनुबंध तोड़ती है या पैनल हटाती है, तो इसका कोई भी वित्तीय या भौतिक बोझ किसान पर नहीं आना चाहिए।
-
कृषि क्षेत्र की वृद्धि: उन्होंने बताया कि देश में गेहूं और धान के भंडार भरे हुए हैं, कृषि विकास दर 4.5 प्रतिशत है और निर्यात 52.55 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर है।
2050 की बिजली मांग पूरी कर सकता है एग्रीवोल्टाइक: प्रह्लाद जोशी
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री श्री प्रह्लाद जोशी ने बताया कि यह सम्मेलन अब तक के सभी छह संस्करणों में सबसे बड़ा है। उन्होंने ऊर्जा क्षेत्र में भारत की तेज प्रगति के आंकड़े प्रस्तुत किए:
-
ऊर्जा क्षमता में वृद्धि: 2014 के 249 गीगावाट से बढ़कर आज कुल बिजली क्षमता 560 गीगावाट पार कर चुकी है।
-
गैर-जीवाश्म स्थापित क्षमता 308 गीगावाट हो गई है, जिसमें से 100 गीगावाट सिर्फ पिछले ढाई साल में जुड़ी है।
-
लागत में भारी कमी: 2012-13 में जो गैर-जीवाश्म बिजली ₹11 प्रति यूनिट थी, वह अब घटकर मात्र ₹2.60 प्रति यूनिट रह गई है।
-
TERI का अध्ययन: देश की 11.6 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से 30% (4.75 करोड़ हेक्टेयर) एग्रीवोल्टाइक के लिए उपयुक्त है।
-
यदि इस उपयुक्त भूमि के मात्र 10 प्रतिशत पर भी यह तकनीक लगाई जाए, तो 2050 तक की पूरी अनुमानित बिजली मांग पूरी की जा सकती है। इससे फसलों की पैदावार में भी 10 से 20 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है।
-
पीएम कुसुम और रोजगार: पीएम कुसुम योजना के तहत 30 लाख कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ा जा चुका है।
-
सरकार जल्द ही दुनिया का सबसे बड़ा एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम शुरू करेगी, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 3.32 लाख पूर्णकालिक स्थानीय रोजगार पैदा होंगे और पलायन रुकेगा।
उद्घाटन समारोह में केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपाद येसो नाईक, जर्मनी के राजदूत डॉ. जैस्पर विक, MNRE सचिव संतोष कुमार सारंगी, कृषि सचिव अतीश चंद्रा, ICAR के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट और अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के महानिदेशक आशीष खन्ना विशेष रूप से उपस्थित रहे।
इस दौरान एग्रीवोल्टाइक से जुड़े कई महत्वपूर्ण तकनीकी टूल्स और संचार सामग्रियों का भी विमोचन किया गया, जो किसानों को खेत स्तर पर सटीक निर्णय लेने में मदद करेंगे।











