Thane Special Court orders release of IRS officer and CGST officials arrested by CBI in a 40 lakh bribery case, terming the arrest illegal

रिश्वत कांड: CBI ने IRS को किया गिरफ्तार, कोर्ट ने बताया गैर-कानूनी

बड़ा झटका: 40 लाख की रिश्वत में CBI ने IRS अधिकारी को किया था गिरफ्तार, कोर्ट ने ‘गैर-कानूनी’ बताकर तुरंत किया रिहा”

स्थान: मुंबई/ठाणे : संतोष सेठ की रिपोर्ट : THE POLITICS AGAIN

भ्रष्टाचार के एक हाई-प्रोफाइल मामले में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) को उस वक्त बड़ा कानूनी झटका लगा, जब ठाणे की विशेष अदालत ने महाराष्ट्र के रायगढ़ में गिरफ्तार किए गए सेंट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (CGST) के वरिष्ठ अधिकारियों की गिरफ्तारी को ही ‘गैर-कानूनी’ करार दे दिया।

कोर्ट ने गिरफ्तारी की कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने के आधार पर सभी आरोपियों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।

क्या था पूरा मामला और कैसे बिछाया गया जाल?

CBI ने 26 अगस्त को CGST सुपरिटेंडेंट राकेश कुमार सिन्हा के खिलाफ मामला दर्ज किया था। आरोप था कि उन्होंने शिकायतकर्ता की स्टोन-क्वेरी (पत्थर खदान) फर्म के GST और रॉयल्टी मामले को रफा-दफा करने के लिए 1.50 करोड़ रुपये की मांग की थी। बाद में यह सौदा 40 लाख रुपये में तय हुआ।

  • रंगे हाथों गिरफ्तारी: आरोपियों ने एक बिचौलिए के जरिए रिश्वत लेने का इंतजाम किया था। CBI ने जाल बिछाकर उस बिचौलिए को 40 लाख नकद लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया।

  • IRS अधिकारी की संलिप्तता: पूछताछ में CGST सुपरिटेंडेंट राकेश कुमार और CGST के एडिशनल कमिश्नर व IRS अधिकारी विनय कुमार कनहेटी (बैच-2009) ने भी रिश्वत में अपनी हिस्सेदारी स्वीकार की थी।

  • रिकवरी: आरोपियों के ठिकानों पर छापेमारी में 43 लाख रुपये नकद और लगभग 90 लाख रुपये के गहने भी बरामद हुए थे।

क्यों कोर्ट ने गिरफ्तारी को माना ‘गैर-कानूनी’?

CBI (ACB मुंबई) ने 5 दिन की पुलिस कस्टडी मांगते हुए अदालत में रिमांड अर्जी दाखिल की थी, लेकिन ठाणे की स्पेशल कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।

बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों (विहान कुमार और मिहिर राजेश शाह मामले) का हवाला देते हुए गिरफ्तारी के तरीके को चुनौती दी।

मजिस्ट्रेट ने अरेस्ट मेमो और केस डायरी की जांच के बाद पाया कि:

  1. रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि आरोपियों को उनकी गिरफ्तारी के आधार और कारणों के बारे में ठीक से बताया गया था।

  2. गिरफ्तारी के वक्त आरोपियों के रिश्तेदारों को लिखित रूप में सूचित नहीं किया गया था (जो कि कानूनी रूप से अनिवार्य है)।

  3. रिश्वत की रकम और मोबाइल फोन पहले ही जब्त हो चुके हैं, ऐसे में आगे कस्टडी में पूछताछ का कोई ‘संतोषजनक कारण’ नहीं है।

तुरंत रिहाई के आदेश

इन कानूनी खामियों के आधार पर अदालत ने तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी को असंवैधानिक और गैर-कानूनी करार दिया।

कोर्ट ने आदेश दिया कि 15,000 रुपये का पीआर बॉन्ड (व्यक्तिगत मुचलका) भरने पर आरोपियों को तुरंत रिहा किया जाए। हालांकि, उन्हें जांच में सहयोग करने का भी निर्देश दिया गया है। मामले की आगे की जांच जारी है।