PM Narendra Modi leads the successful adoption of the New Delhi Declaration at the BRICS Summit 2026, marking a historic diplomatic and institutional victory for India.
ब्रिक्स 2026: भारत की ऐतिहासिक कूटनीतिक जीत, दो युद्धों और गहरे मतभेदों के बीच ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ पर बनी सर्वसम्मति”
नई दिल्ली: संतोष सेठ, संपादक (THE POLITICS AGAIN)
18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में भारत ने अपनी कूटनीतिक क्षमता और वैश्विक नेतृत्व का लोहा मनवाते हुए एक अभूतपूर्व सफलता हासिल की है।
दुनिया में चल रहे दो सक्रिय युद्धों (यूक्रेन संकट और मध्य पूर्व तनाव) और सदस्य देशों के बीच गहराते वैचारिक मतभेदों के बावजूद, 12 सितंबर को सभी सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ को अपना लिया।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेफरी सैक्स ने इसे भारत की एक “बड़ी संस्थागत सफलता” करार दिया है।
उन्होंने कहा कि नई दिल्ली ने अत्यंत चुनौतीपूर्ण समय में भी आम सहमति बनाकर G20 जैसी ही सफलता दोहराई है।
इस आम सहमति को बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महज तीन दिनों में विदेशी नेताओं के साथ 15 औपचारिक द्विपक्षीय बैठकें कीं।
दिल्ली समिट ने भारत को कूटनीतिक मोर्चे पर पांच बड़ी और ऐतिहासिक जीत दिलाई हैं:
समिट के सामने सबसे बड़ी चुनौती मध्य पूर्व का युद्ध था। US-इजरायल-ईरान तनाव के बीच ईरान और UAE के विचार बिल्कुल अलग थे, जिसके कारण मई में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक बेनतीजा रही थी।
लेकिन नई दिल्ली समिट में भारत ने कूटनीतिक चमत्कार करते हुए दोनों देशों को मिडिल ईस्ट में ‘संयम बरतने’ की अपील पर सहमत कर लिया।
इसी मंच पर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन ज़ायद ने मुलाकात की, जो तनाव शुरू होने के बाद सबसे उच्च स्तरीय वार्ता थी।
विस्तार के बाद ब्रिक्स में आम सहमति बनाना मुश्किल हो गया था। अप्रैल 2025 में रियो डी जनेरियो में साझा बयान जारी नहीं हो सका था।
लेकिन नई दिल्ली घोषणापत्र में न केवल भू-राजनीतिक मुद्दों पर, बल्कि डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, AI, सप्लाई चेन और वैश्विक शासन में सुधार पर भी सर्वसम्मति बनी।
घोषणापत्र में भारत की अध्यक्षता की खुलकर तारीफ की गई, जिसने साबित किया कि मतभेदों के बावजूद यह समूह प्रासंगिक और एकजुट रह सकता है।
भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक जीत 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले (जिसमें 26 लोग मारे गए थे) की घोषणापत्र में स्पष्ट निंदा थी।
चीन (जो पाकिस्तान का करीबी है) की मौजूदगी के बावजूद, ब्रिक्स ने इस हमले की “कड़े से कड़े शब्दों में निंदा” की।
घोषणापत्र में आतंकवाद के प्रति “जीरो टॉलरेंस”, टेरर फंडिंग को रोकने और आतंकियों को सुरक्षित पनाहगाह न देने की मांग की गई।
भारत ने इसे द्विपक्षीय मुद्दे के बजाय वैश्विक आतंकवाद के दायरे में रखकर बड़ी कूटनीतिक सफलता पाई।
रूस और चीन की पूरी कोशिश के बावजूद भारत ने ब्रिक्स को एक ‘पश्चिम-विरोधी’ (Anti-West) गठबंधन में नहीं बदलने दिया।
पूर्व राजनयिक वीणा सीकरी के शब्दों में, भारत ने इसे “ग़ैर-पश्चिमी” (Non-West) मंच बनाए रखा। घोषणापत्र में एकतरफ़ा प्रतिबंधों की आलोचना जरूर की गई,
लेकिन मुख्य फोकस UNSC, IMF और विश्व बैंक में सुधारों और विकासशील देशों को ज़्यादा प्रतिनिधित्व देने पर रहा।
विस्तारित ब्रिक्स में अब अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था वाले देश शामिल हैं, जिनमें से दो (रूस और ईरान) सीधे युद्ध में उलझे हैं।
इसके बावजूद भारत ने ऊर्जा बाजार, सप्लाई चेन और खाद्य सुरक्षा जैसे आम सहमति वाले आर्थिक मुद्दों पर फोकस रखा।
नई दिल्ली ने साबित कर दिया कि भारी वैचारिक मतभेदों के बीच भी ‘ग्लोबल साउथ’ के हितों के लिए ब्रिक्स काम कर सकता है।
ब 2027 में अध्यक्षता संभालने जा रहे चीन के लिए इस आम सहमति को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी।
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