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जानिए ! आखिर क्यों दुष्कर्म के फैसले में मुस्लिम जज ने लिखा किष्किंधाकांड की पंक्तिया?

“सांकेतिक चित्र “

“तकरीबन चार साल पहले तीन साल की सगी भतीजी से दुष्कर्म करने के आरोप में अपर जिला जज मोहम्मद नसीम ने ताऊ को दोषी ठहराया है। अपर जिला जज ने अभियुक्त को दरिंदा, पिशाच, भेड़िया बताते हुए फांसी पर तब तक लटकाए रखने की सजा सुनाई है, जब तक दोषी की मौत न हो जाए”

 

Hardoi 06/08/2024 मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 

हरदोई के सांडी थाना क्षेत्र के एक गांव में तीन साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म के मामले में दोषी को फांसी की सजा सुनाए जाने के दौरान अपर जिला जज ने न सिर्फ लिखित बल्कि मौखिक तौर पर भी गंभीर टिप्पणी की।

अपर जिला जज मोहम्मद नसीम ने कहा कि सगी भतीजी के साथ ऐसा व्यहवार इंसान के रूप में एस वहशी जानवर ही कर सकता है।

उन्होंने लिखा कि भारतीय सांस्कृति के समाज को ऐसे पैशाचिक व्यक्ति की आवश्यकता नहीं है और इस प्रवृत्ति के व्यक्ति को समाज में रहने का कोई अधिकारी नहीं है।

अपर जिला जज ने कहा कि अगर अभियुक्त ने हत्या की होती तो शायद सजा कुछ और होती, लेकिन जो अपराध उसने किया है उसमें बच्ची की हत्या हर पल और हर दिन होती है।

उन्होंने अपने फैसले में दोषी जैसे लोगों को समाज में रहने के लायक न होने की टिप्पणी भी की। फांसी की सजा सुनाने के बाद जज ने कलम तोड़ दी।

अपर जिला जज मोहम्मद नसीम ने फांसी की सजा सुनाए जाने के दौरान दुष्कर्म पीड़िता की हालत भी बयां की। फैसले के मुताबिक दुष्कर्म के कारण बच्ची के मल और मूत्र के रास्ते में कोई अंतर नहीं रह गया था।

इसके कारण बच्ची को मल और मूत्र त्याग करने के लिए अलग जगह शरीर में बनानी पड़ी और तब उसकी जान की रक्षा हो पाई।

अपर जिला जज ने इसे पशुवत व्यवहार की संज्ञा दी। कहा कि सगी भतीजी के साथ ऐसा व्यवहार इंसान के रूप में एक वहशी जानवर ही कर सकता है।

उन्होंने लिखा है कि भारतीय संस्कृति के समाज को ऐसे पैशाचिक व्यक्ति की आवश्यकता नहीं है और इस प्रवृत्ति के व्यक्ति को समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं है।

तीन साल उमर, तीन फीट लंबाई, 13 किलो वजन…शर्म भी नहीं आई

मामले की सुनवाई और साक्ष्यों के अवलोकन के दौरान पता चला कि पीड़िता की उम्र घटना के समय तीन साल थी। उसकी लंबाई महज तीन फीट थी।

वजन सिर्फ 13 किलो था, लेकिन फिर भी अभियुक्त को शर्म नहीं आई। हवस के लिए उसने बच्ची की उम्र, रिश्ते का भी लिहाज नहीं किया।

तो न्याय प्रणाली पर लग जाएगा गंभीर प्रश्नचिह्न… न बेटियां बचेंगी न सुरक्षित जी सकेंगी

फैसले में अपर जिला जज मोहम्मद नसीम ने एक अहम तथ्य भी लिखा है। उन्होंने कहा है कि आधुनिक सभ्यता में हम बेटियों सहित संपूर्ण स्त्री जाति के कल्याण व सुरक्षा के लिए अभियान चला रहे हैं, ताकि उन्हें समाज में सुरक्षित और सम्मानित जीवन जीने का अधिकार हो।

ऐसी घटनाओं के प्रति समाज में कठोर रुख नहीं अपनाया जाता है तो न ही बेटियां बचेंगी और ना ही सुरक्षित और सम्मानित जीवन जी सकेंगी।

समाज के न्याय के लिए गुहार को नहीं सुनाया गया तो न्याय प्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाएगा। इससे समाज में असुरक्षा और भयावह स्थिति का उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

फैसले में जज ने लिखा…ताहि बधे कुछ पाप न होई

अपर जिला जज मोहम्मद नसीम ने रामचरितमानस के किष्किंधाकांड की पंक्तियों का उल्लेख भी फैसले में किया है। फैसले में लिखा है कि अनुज वधू भगिनी सुत नारी, सुन सठ कन्या सम ए चारी, इनहहि कुदृष्टि बिलोकई जोई, ताहि बधे कुछ पाप न होई।

इसका मतलब यह हुआ कि छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्र की स्त्री और कन्या यह चारों समान हैं। इन्हें जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है उसका वध करने में कोई पाप नहीं होता।

फैसला सुनने न तो पीड़ित पक्ष से कोई आया न किसी ने अभियुक्त से की मुलाकात

घटना के बाद से जिला जेल में बंद दोषी से जेल में जाकर किसी भी परिजन ने कोई मुलाकात नहीं की। उसकी पैरवी भी नहीं हो रही थी। हालांकि उसके लिए शासन ने न्याय मित्र के तौर पर वरिष्ठ अधिवक्ता रामेंद्र सिंह तोमर को लगाया था।

फैसला सुनाए जाने के दौरान सोमवार को पीड़ित पक्ष से कोई नहीं आया। दरअसल घटना के कुछ समय बाद से ही पीड़िता अपने माता-पिता के साथ फरीदाबाद में जाकर रहने लगी थी। वहीं पीड़िता के माता-पिता मजदूरी करते हैं।

एक नजर महत्वपूर्ण आंकड़ों और तारीखों पर

  • 28 जुलाई 2020 को हुई घटना, रिपोर्ट भी दर्ज
  • 29 जुलाई 2020 को अभियुक्त गिरफ्तार हुआ
  • 6 अक्तूबर 2020 को चार्जशीट दाखिल
  • 26 सितंबर 2020 को विधि विज्ञान प्रयोगशाला की पहली रिपोर्ट आई
  • 11 जून 2021 को विधि विज्ञान प्रयोगशाला की दूसरी रिपोर्ट आई
  • आठ गवाह पेश हुए
  • 22 अभिलेखीय साक्ष्य दिए गए
  • 91 तारीखों में हुई मामले की सुनवाई
  • 26 जून 2023 को हुई पहली गवाही (पीड़िता) . 10 जुलाई 2024 को हुई आखिरी गवाही (विवेचक)
  • 30 जुलाई 2024 को दोषी करार दिया गया
  • 5 अगस्त 2024 को हुई फांसी की सजा
Santosh SETH

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