“पूरा देश आज 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाएगा, इसी दिन जम्मू कश्मीर में कारगिल और द्रास सेक्टर की पहाड़ियों पर भारतीय सेना का चलाया ऑपरेशन विजय सफलतापूर्वक पूरा हुआ था”
कारगिल… एक ऐसा नाम जो जुड़ा है वीरगाथा से, बलिदान से और साहस की अनगिनत कहानियों से। यही वो जगह है जहां साल 1999 में भारतीय सेना ने घुसपैठ करने वाले पाकिस्तानी फौजियों से लोहा लेते हुए जीत का परचम ऊंची-ऊंची चोटियों पर लहराया था।
इसी की याद में 26 जुलाई 2024 को देश 25वां कारगिल विजय दिवस मना रहा है। हालांकि यह नाम और इसका इतिहास सिर्फ कारगिल युद्ध तक सीमित नहीं है बल्कि इस नाम के पीछे भी दिलचस्प इतिहास छिपा हुआ है। एक नजर डालते हैं कारगिल से जुड़े ऐसे ही रोचक तथ्यों के बारे में….
लगभग 1.25 लाख की आबादी वाला कारगिल 14,086 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। यह श्रीनगर से लेह की ओर 205 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कारगिल को आज की दुनिया में आगाओं की धरती कहा जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कारगिल में ज़्यादातर शिया मुसलमान रहते हैं और आगा धार्मिक प्रमुख और उपदेशक को कहा जाता है।
कारगिल नाम दो शब्दों खार और आरकिल से बना है। खार का मतलब है महल और आरकिल का मतलब है केंद्र, यानी महलों के बीच की जगह क्योंकि यह जगह आज के जम्मू कश्मीर राज्य में कई रजवाड़ों या किंगडम के बीच स्थित रही है।
कई आलोचकों के अनुसार कारगिल शब्द गर और खिल शब्दों से बना है। स्थानीय भाषा में गर का मतलब है ‘कोई भी जगह’ और खिल का मतलब है एक केंद्रीय स्थान जहां लोग रह सकते हैं। इसका समर्थन इस तथ्य से होता है कि यह स्थान श्रीनगर, स्कर्दू , र्लह और पदुम से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर है।
समय बीतने के साथ खार आरकिल या गर खिल को कारगिल के नाम से जाना जाने लगा। वर्तमान नौकरशाह और इतिहासकार परवेज दीवान ने अपनी किताब ‘कारगिल ब्लंडर’ में बताया है कि कारगिल नामक एक अग्रणी ने थाथा खान के यहां आने से पहले पोयेन और शिलिकचाय क्षेत्र में जंगलों को साफ किया और बाद में उसने इस जगह का नाम रखा।
थाथा खान को ऐसा प्रमुख योद्धा कहा जाता है जिसने इस क्षेत्र में एक राजवंश की स्थापना की। 15वीं शताब्दी में इस्लाम कारगिल में आया। मध्य एशिया के शिया स्कूल के विद्वान मीर शम्स-उद-दीन इराकी ने इस्लाम का प्रचार करने के लिए अपने मिशनरियों के साथ बाल्टिस्तान और कारगिल का दौरा किया।
प्राचीन समय में, वर्तमान कारगिल के अधिकांश भाग का नाम पुरीक था। यह नाम तिब्बती विद्वानों द्वारा दिया गया है क्योंकि भूमि के इस हिस्से में रहने वाले लोगों में तिब्बतियों वाली विशेषताएं हैं। द्रास में दर्द जाति के लोग रहते हैं और ज़ांस्कर में लद्दाखी-तिब्बती वंश है।
कारगिलियों के नस्लीय वंश आर्यन, दर्द, तिब्बती और मंगोलॉयड हैं। यहां इस्लाम के अलावा बौद्ध धर्म के अनुयायी भी मौजूद हैं।कारगिल एक ऐसा स्थान है जहां बहु-जातीय, बहु-भाषी, बहु-सांस्कृतिक लोग रहते हैं। यहां के लोग ब्रोगपा, बाल्टिस, पुरिक, शिना और लद्दाखी हैं।
यहां बोली जाने वाली भाषाएं शिना, बाल्टी, पुरीग, लद्दाखी हैं। बाल्टी और शिना भाषाएं उर्दू लिपि में लिखी जाती हैं, इसलिए इस क्षेत्र में उर्दू आम है। कारगिल वर्ष 1979 में लद्दाख क्षेत्र में एक अलग जिला बन गया था, जब इसे पूर्ववर्ती लेह जिले से अलग कर दिया गया था।
लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद कारगिल को जुलाई 2003 में जिले में कमीशन किया गया था।लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद में 30 पार्षद हैं, जिनमें से 26 पार्षद चुने जाते हैं जबकि शेष 4 मनोनीत होते हैं। कारगिल जिले में नौ प्रशासनिक ब्लॉक हैं।
आज यानी 26 तारीख को देश कारगिल विजय दिवस की रजत जयंती का महोत्सव बनाएगा। यह दिन हमारे उन जांबाजों को समर्पित है, जिन्होंने पाक सैनिकों के छक्के छुड़ाते हुए कारगिल की ऊंची चोटियों को दुश्मन से आजाद करवाया था।
खास बात है कि यह लड़ाई उस दौरान करीब दो महीनों तक चली थी। कारगिल की पहाड़ियों को दुश्मन से मुक्त कराने के लिए सेना ने ऑपरेशन विजय चलाया (Operation Vijay) था। इस युद्ध में करीब 2 लाख सैनिकों ने हिस्सा लिया था। वहीं, इस युद्ध में सेना के 527 जांबाज बलिदान हुए थे।
कारगिल युद्ध मई से जुलाई 1999 के बीच भारतीय और पाकिस्तानी सेनाओं के बीच लड़ा गया था। यह युद्ध जम्मू-कश्मीर राज्य के कारगिल जिले में हुआ। 1999 की शुरुआत में, पाकिस्तानी सैनिकों ने गुप्त रूप से नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार कर भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की और कारगिल की ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया था।
ऑपरेशन विजय
भारतीय सेना ने इस घुसपैठ का पता लगाने के बाद ऑपरेशन विजय शुरू किया। भारतीय सेना ने दुर्गम भूभाग और प्रतिकूल मौसम के बावजूद साहस और दृढ़ संकल्प का परिचय देते हुए धीरे-धीरे पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ना शुरू किया। भारतीय वायुसेना ने भी ऑपरेशन सफेद सागर के तहत हवाई हमलों से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पाकिस्तान की सेना ने 5 मई 1999 को भारत के 5 सैनिकों को मार दिया था, उसके बाद भारतीय सेना की ओर से 10 मई 1999 को ‘ऑपरेशन विजय’ की शुरुआत कर दी गयी है। करीब 2 महीने तक चले युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने 20 जून 1999 को टाइगर हिल पर लगातार 11 घंटे तक लड़ाई लड़ने के बाद प्वाइंट 5060 और प्वाइंट 5100 पर अपना कब्जा कर लिया।
बिल क्लिंटन ने नवाज शरीफ की मुलाकात के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने 5 जुलाई 1999 को अपने सैनिकों को वापस बुलाने का आदेश दिया। पाकिस्तानी सेना के पीछे हटने के बाद भारतीय सेना ने 11 जुलाई 1999 को बटालिक की चोटियों पर भी अपना अधिकार जमा लिया। अंत में 14 जुलाई को भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ के सफल होने की घोषणा की।
26 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध पूर्ण रूप से समाप्त हो गया और इसी दिन को भारत में कारगिल विजय दिवस के जाता है।
कारगिल युद्ध के कुछ हीरो
कारगिल युद्ध में बहुत से सैनिकों ने बहादुरी का परिचय दिया। इस युद्ध में भारत के बहुत से सैनिकों ने अपनी जान भी गंवाई। कारगिल युद्ध में कुछ सैनिकों के नाम इस प्रकार हैं-
कैप्टन विक्रम बत्रा
कैप्टन विक्रम बत्रा 13वीं बटालियन, जम्मू और कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर मौजूद थे। कारगिल युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देने के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
योगेन्द्र सिंह
यादव योगेन्द्र सिंह यादव ग्रेनेडियर के पद पर तैनात थे। पाकिस्तान के साथ मोर्चा लेते समय योगेन्द्र सिंह के साथ उनके टीम के 2 अधिकारियों, 2 जूनियर कमीशंड अधिकारियों और 21 सैनिक शहीद हो गए। मरणोपरांत उन्हें परमवीर चक्र प्रदान किया। वे भारत में परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले सबसे युवा व्यक्ति थे।
मनोज कुमार पांडे
मनोज कुमार पांडे 1/11 गोरखा राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर तैनात थे। उनकी बहादुरी के चलते भारत ने बटालिक सेक्टर में जौबार टॉप और खालुबार पहाड़ी पर कब्जा किया। मरणोपरांत उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
बलवान सिंह
बलवान सिंह 18 ग्रेनेडियर्स में लेफ्टिनेंट के पद पर तैनात थे। उनको टाइगर हिल पर कब्जा करने का काम सौंपा गया जो उन्होंने बखूबी अंजाम दिया। घायल होने बाद भी उन्होंने टाइगर हिल पर कब्जा करने में अदम्य साहस का परिचय दिया जिसके चलते उनको महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
कैप्टन एन केंगुरुसे
नगालैंड के रहने वाले कैप्टन एन केंगुरुसे प्लाटून कमांडर के पद पर तैनात थे। युद्ध के दौरान उनके द्वारा देश के लिए दिखाए गए समर्पण के चलते उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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