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दुनिया में शांति अब ‘सौदे’ से तय होगी? ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का $1 बिलियन वाला फॉर्मूला

“दुनिया की कूटनीति एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इर्द-गिर्द घूमने लगी है। गाजा युद्धविराम और पुनर्निर्माण के नाम पर पेश किया गया उनका नया ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) प्रस्ताव अब वैश्विक अशांति का कारण बन गया है”

वॉशिंगटन/नई दिल्ली | The Politics Again संतोष सेठ की रिपोर्ट। दिनांक: 22 जनवरी, 2026

ट्रंप की यह पहल संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसी स्थापित संस्थाओं के लिए एक सीधी चुनौती बनकर उभरी है, जिसने दुनिया को दो धड़ों में बांट दिया है।

सबसे चौंकाने वाली शर्त यह है कि इस ‘शांति बोर्ड’ की स्थायी सदस्यता के लिए न्यूनतम एक अरब डॉलर (Approx. ₹8000 करोड़) का योगदान अनिवार्य किया गया है। यानी अब वैश्विक शांति में भागीदारी ‘नैतिकता’ से नहीं, बल्कि ‘आर्थिक हैसियत’ से तय होगी।

मध्य पूर्व का समर्थन, यूरोप में बगावत

ट्रंप की इस 20-सूत्रीय योजना पर दुनिया की प्रतिक्रिया बंटी हुई है:

  • समर्थक देश: सऊदी अरब, यूएई, कतर, मिस्र, जॉर्डन, तुर्की, इंडोनेशिया और पाकिस्तान ने इस बोर्ड में शामिल होने की हामी भरी है।

  • इनका मानना है कि संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रियाएं बेहद धीमी और जटिल हैं, जबकि ट्रंप का यह कॉरपोरेट स्टाइल मॉडल त्वरित निर्णय (Quick Decisions) ले सकता है।

  • विरोधी खेमा: फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन और स्लोवेनिया जैसे यूरोपीय देशों ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है।

  • उनका कहना है कि वे किसी ऐसे मंच का हिस्सा नहीं बनेंगे जो अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र की वैधता को कमजोर करता हो। वहीं, ब्रिटेन और जर्मनी अभी असमंजस की स्थिति में हैं।

पुतिन का ‘मास्टरस्ट्रोक’: फ्रीज एसेट्स का दांव

इस पूरे घटनाक्रम में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक दिलचस्प चाल चली है। पुतिन ने प्रस्ताव दिया है कि अमेरिका में फ्रीज (जब्त) की गई रूसी संपत्तियों में से 1 अरब डॉलर ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को दिए जा सकते हैं।

  • पुतिन की रणनीति: यह केवल दान नहीं, बल्कि एक सोची-समझी कूटनीति है। अमेरिका में रूस की करीब 4-5 अरब डॉलर की संपत्ति फ्रीज है।

  • पुतिन इसके जरिए ट्रंप को संदेश देना चाहते हैं कि रूस टकराव नहीं, बल्कि ‘सौदेबाजी’ के लिए तैयार है।

  • शर्तें: पुतिन ने साफ किया है कि यह पैसा गाजा के पुनर्निर्माण में लगे, लेकिन यह प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र के निर्णयों के आधार पर होनी चाहिए। साथ ही, बोर्ड में शामिल होने का फैसला वे अपने रणनीतिक साझेदारों से पूछकर ही लेंगे।

भारत का रुख: ‘वेट एंड वॉच’

भारत के लिए यह स्थिति कूटनीतिक रूप से नाजुक है।भारत को भी ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का न्योता मिला है।

  • नई दिल्ली ने अभी तक कोई स्पष्ट सहमति नहीं दी है। भारत परंपरागत रूप से संयुक्त राष्ट्र और नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था (Multilateralism) का समर्थक रहा है।

  • विदेश मंत्रालय यह आकलन कर रहा है कि क्या यह बोर्ड वास्तव में शांति लाएगा या यह केवल अमेरिका का एक नया राजनीतिक हथियार है।

शांति का बाजारीकरण: UN पर अस्तित्व का संकट?

ट्रंप का यह मॉडल 21वीं सदी की कूटनीति का नया चेहरा है— “जिसके पास पैसा, उसी की शांति।” संयुक्त राष्ट्र की ताकत उसकी सार्वभौमिकता थी, जहाँ छोटा देश भी अपनी बात रख सकता था।

लेकिन ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में सीट खरीदी जा सकती है। अगर यह प्रयोग सफल हुआ, तो संयुक्त राष्ट्र महज एक औपचारिक संस्था बनकर रह जाएगा और वैश्विक फैसले चंद अमीर देशों के क्लब द्वारा लिए जाएंगे।

The Politics Again का नज़रिया

ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ शांति से ज्यादा शक्ति संतुलन (Power Balance) को बदलने का औजार प्रतीत होता है।

यह दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या भविष्य में युद्ध और शांति के फैसले सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि डॉलर की चमक और बाजारी सौदों पर आधारित होंगे।

Santosh SETH

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