क्या है चीन का ‘फाइव फिंगर प्लान’? अरुणाचल और लद्दाख पर ड्रैगन की नजर
माओ के ‘फाइव फिंगर्स प्लान’ पर काम कर रहा है चीन? अरुणाचल और लद्दाख पर ड्रैगन की नजर, भारत का दो टूक जवाब”
नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
ड्रैगन यानी चीन (China) हमारी सीमाओं पर लगातार आंखें दिखा रहा है। हालिया घटनाक्रमों और बॉर्डर से आ रही रिपोट्स के बाद यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या बीजिंग आज भी अपने संस्थापक नेता माओ त्से-तुंग के 68 साल पुराने विस्तारवादी सपने को पूरा करने की गुप्त साजिश रच रहा है?
भारत की संप्रभुता के लिए सबसे बड़ा खतरा बनी हुई चीन की ‘फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत’ (Five Fingers of Tibet) पॉलिसी आज भी उसकी हर चाल के पीछे दिखाई देती है।
क्या है माओ का ‘फाइव फिंगर प्लान’?
1949 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (CPC) की स्थापना के बाद से ही इसके नेताओं की महत्वाकांक्षा विस्तारवादी रही है।
साल 1958 में बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर से माओ त्से-तुंग ने अपनी खतरनाक ‘फाइव फिंगर्स पॉलिसी’ का खाका खींचा था।
- हथेली (Palm): माओ ने ‘तिब्बत’ को चीन के दाहिने हाथ की हथेली बताया, जिस पर उसने शुरुआती दौर में ही अवैध कब्जा कर लिया था।
- पांच उंगलियां (Five Fingers): माओ ने लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और अरुणाचल प्रदेश को इस हथेली की पांच उंगलियां कहा था।
माओ का स्पष्ट मानना था कि ये पांचों इलाके या तो भारत के कब्जे में हैं या उसके सीधे प्रभाव में हैं, और इन्हें ‘आजाद’ कराकर चीन की हथेली (तिब्बत) से दोबारा जोड़ना बीजिंग का ऐतिहासिक धर्म है।
हालांकि इस अघोषित ब्लूप्रिंट को कभी सरकारी दस्तावेजों में दर्ज नहीं किया गया, लेकिन 1962 के युद्ध से लेकर डोकलाम और गलवान घाटी की हिंसक झड़पों तक, भारत को घेरने की हर चीनी चाल के पीछे इसी गुप्त नीति का साया रहा है।
इनमें से तीन इलाके (लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल) सीधे तौर पर भारत का हिस्सा हैं।
अरुणाचल प्रदेश में PPA की चिंताजनक रिपोर्ट
हाल ही में अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले के ताक्सिंग इलाके से बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है।
‘द अरुणाचल टाइम्स’ के अनुसार, क्षेत्रीय दल पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (PPA) की एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि:
- चीनी सेना (PLA) ने भारतीय सैनिकों को ताक्सिंग के रणनीतिक पेट्रोलिंग पॉइंट्स तक जाने से रोक दिया है।
- पूर्व मंत्री काहफा बेंगिया की अगुवाई वाली टीम ने 10 जुलाई को ताक्सिंग का दौरा किया और पाया कि LAC के पास भारतीय चरवाहों और शिकारियों के पारंपरिक इलाकों पर चीन धीरे-धीरे अपना अवैध कब्जा बढ़ा रहा है।
हालांकि, एक प्रमुख न्यूज एजेंसी की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, सोशल मीडिया पर किए जा रहे धीरे-धीरे कब्जे के दावों का खंडन किया गया है।
लेकिन रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि 1960 से ही चीन अरुणाचल प्रदेश के लगभग 69,000 वर्ग किलोमीटर इलाके पर अपना बेबुनियाद दावा ठोकता आया है और इसे “दक्षिणी तिब्बत” (Zangnan) कहता है।
भारत का चीन को दो टूक जवाब
चीन के इन दावों और आपत्तियों के बीच भारत ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। हाल ही में भारत ने अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और भौगोलिक फीचर्स को उनके आधिकारिक नामों के साथ अपने सरकारी नक्शे में दर्ज किया था। इस पर चीन ने आपत्ति जताते हुए इस कदम को गैरकानूनी बताया।
चीन की आपत्ति को खारिज करते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 11 अगस्त को स्पष्ट किया:
- “अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अटूट हिस्सा है। चीन की आपत्तियों या जगहों के नाम बदलने से जमीन की हकीकत (Status) पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।”
- भारत सरकार का मकसद बॉर्डर को फिर से तय करना नहीं, बल्कि सरकारी नक्शे में जगहों की सही पहचान दर्ज करना है।
सीमा पर शांति के लिए बातचीत भी जारी
एक तरफ जहां चीन की तरफ से बयानबाजी और दबाव की राजनीति चल रही है, वहीं दोनों देशों के बीच सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए कूटनीतिक बातचीत भी जारी है।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, 6 अगस्त को नई दिल्ली में भारत-चीन सीमा मामलों (WMCC) की 36वीं बैठक आयोजित की गई।
इस बैठक में LAC की स्थिति, बॉर्डर मैनेजमेंट और सीमा सहयोग पर चर्चा हुई। भारत ने स्पष्ट रूप से चीन को संदेश दिया है कि द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए सीमा पर शांति और स्थिरता पहली शर्त है।











