उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी कमर कस ली है। भाजपा, सपा और बसपा नए सामाजिक समीकरणों के साथ जनता के बीच पहुंच रही हैं।
यूपी चुनाव 2027: सत्ता के महासंग्राम के लिए बिछने लगी सियासी बिसात, ‘PDA’ के जवाब में BJP का ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’, जानें मायावती का प्लान?
लखनऊ : THE POLITICS AGAIN डेस्क (पॉलिटिकल रिपोर्ट): संतोष सेठ की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं।
जुलाई 2026 के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखें, तो सूबे की राजनीति में शह-मात का खेल अपने चरम पर पहुंच रहा है।
2024 के लोकसभा चुनावों में बदले हुए सामाजिक समीकरणों ने सभी राजनीतिक दलों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) जहाँ डैमेज कंट्रोल और हिंदुत्व के साथ विकास के मॉडल पर फोकस कर रही है, वहीं मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (SP) अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को और अधिक धार देने में जुटी है।
बहुजन समाज पार्टी (BSP) अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। आइए समझते हैं 2027 के लिए यूपी की नई ‘सियासी बिसात’।
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) इन दिनों जबरदस्त आत्मविश्वास में हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के शानदार प्रदर्शन के बाद, सपा ने 2027 के लिए अपना ‘PDA’ अभियान और तेज कर दिया है।
सोशल इंजीनियरिंग: सपा अब केवल यादव-मुस्लिम वोट बैंक तक सीमित नहीं है। पार्टी ने हाल ही में करीब 100 सामान्य और आरक्षित सीटों पर दलित उम्मीदवारों को उतारने का जो ब्लूप्रिंट तैयार किया है, वह इसकी नई सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा है।
संगठनात्मक ढांचा: अखिलेश यादव लगातार जिलों का दौरा कर रहे हैं और बूथ स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर रहे हैं।
उनका मुख्य जोर अति-पिछड़ी जातियों (MBC) और गैर-जाटव दलितों को साधने पर है, जो कभी भाजपा का मजबूत वोट बैंक माने जाते थे।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के नेतृत्व में भाजपा ने तीसरी बार सत्ता में लौटने के लिए अपनी रणनीति को आक्रामक कर दिया है।
2024 के झटकों से सबक लेते हुए, पार्टी ने ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ (Micro-management) शुरू कर दिया है।
कानून-व्यवस्था और विकास: सीएम योगी का ‘बुल्डोजर मॉडल’ और सख्त कानून-व्यवस्था अभी भी भाजपा का सबसे बड़ा चुनावी हथियार है।
इसके साथ ही, राज्य में चल रहे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (एक्सप्रेसवे, जेवर एयरपोर्ट) को चुनाव से पहले जनता के सामने बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा रहा है।
जातीय समीकरणों की मरम्मत: भाजपा ने उन जातीय क्षत्रपों और ओबीसी (OBC) नेताओं को फिर से सक्रिय करना शुरू कर दिया है, जो लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी से नाराज चल रहे थे।
संघ (RSS) और भाजपा के बीच समन्वय को बढ़ाकर जमीनी स्तर पर हिंदुत्व के ध्रुवीकरण को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।
मायावती (Mayawati) के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी के लिए 2027 का चुनाव करो या मरो की स्थिति वाला है।
लगातार गिरते वोट शेयर और हाशिए पर जाती राजनीति के बीच बसपा अब अपने ‘कोर दलित’ (जाटव) वोट बैंक को सहेजने में लगी है।
पार्टी ने राज्य भर में कैडर कैंप शुरू कर दिए हैं। मायावती का पूरा फोकस इस बात पर है कि सपा और कांग्रेस का गठबंधन उनके बचे हुए वोट बैंक में सेंध न लगा पाए। हालांकि, मजबूत जमीनी नेतृत्व की कमी बसपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
कांग्रेस पार्टी (Congress) उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की बैसाखी के सहारे ही सही, लेकिन वापसी की उम्मीद कर रही है।
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के दौरों से पार्टी कार्यकर्ताओं में जो ऊर्जा आई थी, उसे 2027 तक बनाए रखना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है।
कांग्रेस का लक्ष्य मुस्लिमों और सवर्णों के एक तबके को अपने साथ जोड़ने का है, ताकि गठबंधन में वह अधिक सीटों पर दावेदारी कर सके।
2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सिर्फ सत्ता का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह कई क्षेत्रीय क्षत्रपों के राजनीतिक भविष्य का फैसला भी करेगा।
एक तरफ योगी आदित्यनाथ का अभेद्य दुर्ग है, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव का नया और धारदार ‘PDA’ समीकरण।
आने वाले कुछ महीनों में टिकट बंटवारे से लेकर रैलियों के मंच तक, यह सियासी बिसात और भी उलझेगी और दिलचस्प होगी।
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