Politics

राहुल गांधी के उलट आनंद शर्मा ने की मोदी सरकार की विदेश नीति की तारीफ

कांग्रेस में ‘कूटनीतिक’ दरार: राहुल के हमलों के बीच आनंद शर्मा ने की मोदी सरकार की तारीफ, कहा- ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ 

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

केंद्र की मोदी सरकार की विदेश नीति को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के भीतर एक बड़ी वैचारिक दरार खुलकर सामने आ गई है।

एक तरफ जहां कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार मोदी सरकार की कूटनीति को विफल साबित करने के लिए आक्रामक बयानबाजी कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के ही अनुभवी और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार दिग्गज नेता इस नैरेटिव को ध्वस्त करते नजर आ रहे हैं।

पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने मोदी सरकार की संतुलित कूटनीति की खुलकर सराहना कर पार्टी के भीतर एक नई बहस छेड़ दी है।

आनंद शर्मा ने की ‘संतुलित कूटनीति’ की तारीफ

पूर्व विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा ने स्पष्टता और दृढ़ता के साथ मोदी सरकार की कूटनीति को परिपक्व और कुशल बताया है।

पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने जिस संतुलन का परिचय दिया है, वही असली कूटनीति है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि इस संकट में किसी एक पक्ष की तरफ झुकाव दिखाना भारत जैसे देश के लिए खतरनाक हो सकता था।

शर्मा ने खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा को मानवीय और सबसे बड़ी चुनौती बताते हुए भारतीय राजनयिकों की भी जमकर तारीफ की।

उन्होंने कहा कि हमारे राजनयिक तिरंगे को ऊंचा रखकर देशवासियों की रक्षा कर रहे हैं, जो यह साबित करता है कि जमीन पर काम करने वाले ही असली नायक होते हैं।

थरूर और तिवारी भी कर चुके हैं सरकार का समर्थन

यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विदेश नीति पर सरकार का साथ दिया हो।

इससे पहले शशि थरूर और मनीष तिवारी भी इसी लाइन पर बयान दे चुके हैं। मनीष तिवारी ने तो साफ कहा था कि पश्चिम एशिया का विवाद “भारत का युद्ध नहीं है” और सरकार ने अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) का सही परिचय दिया है।

उन्होंने ऊर्जा सुरक्षा, उर्वरक आपूर्ति और क्षेत्र में बसे करोड़ों भारतीयों के हितों के मद्देनजर सरकार की दिशा को बिल्कुल सही ठहराया था।

कांग्रेस का अंदरूनी विरोधाभास उजागर

इन दिग्गज नेताओं के बयानों ने कांग्रेस के उस धड़े को आईना दिखाया है, जो हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश करता है।

जहां पवन खेड़ा और जयराम रमेश जैसे नेता भारत की वैश्विक भूमिका पर सवाल उठाते हुए इसे कूटनीतिक विफलता बता रहे हैं, वहीं आनंद शर्मा की यह नसीहत कि “राजनीतिक दलों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता का परिचय देना चाहिए,” कांग्रेस आलाकमान के लिए एक असहज स्थिति पैदा कर रही है।

पश्चिम एशिया का संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती है। ऐसे में भारत द्वारा अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और जहाजों का सुरक्षित संचालन सरकार की जमीनी सफलता को दर्शाता है।

अब देखना यह है कि कांग्रेस अपने भीतर पनप रहे इस गहरे वैचारिक विरोधाभास को कैसे संभालती है।

Santosh SETH

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