International

ट्रंप-जिनपिंग वार्ता: अमेरिका-चीन संबंधों का भारत और रूस पर असर

ट्रंप-जिनपिंग की ‘व्यावहारिक दोस्ती’ और अमेरिकी डीप स्टेट की नई बिसात: वैश्विक बादशाहत के संकट के बीच चीन के दरबार में क्यों झुका अमेरिका?

वाशिंगटन/बीजिंग: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

वैश्विक राजनीति और कूटनीति के पटल से इस वक्त की सबसे बड़ी सुगबुगाहट सामने आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हाल ही में बढ़ती संवाद-प्रक्रिया और संभावित रणनीतिक समझौते को दुनिया बेहद गंभीरता से देख रही है।

बदलती वैश्विक दुनियादारी और नवमहत्वाकांक्षी देशों व गुटों की मतलबी कूटनीति-अर्थनीति ने आज अमेरिका और चीन, दोनों की अंतरराष्ट्रीय बादशाहत को खतरे में डाल दिया है।

एक तरफ जहां रूस और भारत अपनी दशकों पुरानी अटूट मित्रता पर अडिग हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप भी अपने पुराने संबंधों को तरोताजा करने में जुटे हैं, जो कि अमेरिकी ‘डीप स्टेट’ की बिल्कुल नई बिसात समझी जा रही है।

जाल में फंसा अमेरिका: कूटनीतिक प्रेम या भूल सुधार?

देखा जाए तो भारत की चतुराई और रूस की दृढ़ता के आगे अमेरिका अपने ही बुने हुए जाल में फंसकर तड़फड़ा रहा है।

रूस-चीन की रणनीतिक समझदारी के कारण पश्चिमी एशिया (मिडिल ईस्ट) में अमेरिका की जो फजीहत हुई है, उसके बाद अब वाशिंगटन के पास बीजिंग के समक्ष हथियार डालने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है।

डोनाल्ड ट्रंप भले ही ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (MAGA) के फॉर्मूले पर काम कर रहे हों, लेकिन रूस, भारत, फ्रांस, ब्राजील और जापान जैसे देशों ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।

ऐसे में पाकिस्तान को साधकर अरब जगत में अपनी इज्जत बचाना और चीन के दरबार में हाजिरी लगाना ही ट्रंप की मजबूरी बन गया है।

उनके बीच कूटनीतिक प्रेम की यह नई पहल वास्तव में अमेरिका की ‘भूल सुधार रणनीति’ मानी जा रही है।


रिश्तों में नरमी के 4 बड़े वैश्विक और आर्थिक प्रभाव

चूंकि दोनों महाशक्तियां दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और सामरिक ताकतें हैं, इसलिए इनके बीच का “व्यावहारिक समझौता” पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा:

  • वैश्विक बाजारों में स्थिरता: अमेरिका-चीन के बीच ट्रेड वॉर (व्यापार युद्ध) कम होने से शेयर बाजारों और निवेशकों का भरोसा बहाल होगा।

  • इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा और विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्रों को सप्लाई चेन संकट से बड़ी राहत मिल सकती है।

  • तेल और ऊर्जा बाजार: दोनों देशों के सहयोग से वैश्विक ऊर्जा कीमतों में अनिश्चितता घटेगी। मध्य पूर्व (Middle East) में चल रहे युद्ध को शांत कराने के लिए दोनों महाशक्तियां मिलकर संयुक्त दबाव बना सकती हैं।

  • डॉलर बनाम युआन: चीन लंबे समय से डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व को चुनौती दे रहा है। रिश्तों में सुधार के बाद अमेरिका चीन को कुछ आर्थिक छूट दे सकता है, लेकिन वैश्विक व्यापार में डॉलर की केंद्रीय भूमिका तुरंत कमजोर नहीं होने वाली।

  • रूस, यूरोप और भारत का सियासी गणित:

    • रूस: राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए यह स्थिति मिश्रित होगी। अमेरिका-चीन की नजदीकी से रूस की सामरिक उपयोगिता थोड़ी घट सकती है, लेकिन चीन अपनी ऊर्जा और सैन्य जरूरतों के लिए रूस का साथ पूरी तरह नहीं छोड़ेगा।

    • यूरोप: यूरोपीय देश व्यापारिक राहत तो महसूस करेंगे, लेकिन उन्हें यह डर भी सताएगा कि कहीं अमेरिका अपनी सौदेबाजी में यूरोपीय हितों को पीछे न धकेल दे।


भारत के लिए क्या हैं अवसर और चुनौतियाँ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में आगे बढ़ रहे भारत के लिए वाशिंगटन और बीजिंग की यह नजदीकी अवसर और चुनौती दोनों लेकर आएगी:

संभावित अवसर:

  • वैश्विक व्यापार स्थिर होने से भारतीय निर्यात (Export) को बड़ा लाभ मिलेगा।

  • अमेरिका और चीन, दोनों ही वैश्विक संतुलन बनाए रखने के लिए भारत को ‘संतुलनकारी शक्ति’ (Balancing Power) के रूप में महत्व देते रहेंगे।

  • चीन पर निर्भरता कम करने के लिए दुनिया भारत को एक मजबूत ‘वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र’ के रूप में चुनेगी।

संभावित चुनौतियाँ:

  • यदि अमेरिका चीन के प्रति नरम होता है, तो भारत पर चीन-विरोधी रणनीतिक दबाव बढ़ सकता है।

  • वैश्विक मोर्चे से निश्चिंत होकर चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और सीमा विवादों पर अधिक आक्रामक व आत्मविश्वासी रुख अपना सकता है।

  • चीन को घेरने के लिए बने ‘क्वाड’ (QUAD) जैसे शक्तिशाली समूहों की रणनीतिक धार थोड़ी कम हो सकती है।

क्या यह स्थायी दोस्ती होगी?

इसका सीधा जवाब है- बिल्कुल नहीं। अमेरिका और चीन के बीच की प्रतिस्पर्धा संरचनात्मक है। तकनीकी वर्चस्व, सैन्य प्रभुत्व, वैश्विक व्यापार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और इंडो-पैसिफिक रणनीति जैसे मुद्दों पर दोनों के हित हमेशा टकराते रहेंगे।

इसलिए यह कोई “पूर्ण मित्रता” नहीं, बल्कि महज एक “व्यावहारिक समझौता” है।

इस पुनर्मिलन का सबसे बड़ा वैश्विक संदेश यही है कि दुनिया अब ‘बहुध्रुवीय व्यवस्था’ (Multipolar World) की ओर बढ़ चुकी है।

जहाँ अमेरिका अकेला निर्णायक नहीं है; बल्कि भारत, रूस, यूरोप, ब्राजील और खाड़ी देश भी अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र को मजबूत कर शक्ति-संतुलन को नया आकार दे रहे हैं।

Santosh SETH

Recent Posts

UP : भाजपा की ‘पदयात्रा’ से विपक्ष को चुनौती, जानें इसके राजनीतिक मायने

उत्तर प्रदेश में भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा: 2027 के चुनाव की बिसात…

10 hours ago

पीएम मोदी के एक फोन कॉल ने बढ़ाई महाराष्ट्र की सियासी हलचल

पीएम मोदी के एक 'फोन कॉल' से महाराष्ट्र की सियासत में भूचाल! क्या NDA का…

10 hours ago

दिल्ली: चावड़ी बाजार में ढही निर्माणाधीन 3 मंजिला इमारत, कोई हताहत नहीं

दिल्ली के चावड़ी बाजार में बड़ा हादसा: निर्माणाधीन 3 मंजिला इमारत का हिस्सा ढहा, लेंटर…

10 hours ago

उत्तरकाशी: गंगोत्री हाईवे पर गहरी खाई में गिरा वाहन, 5 यात्रियों की मौत

उत्तरकाशी में बड़ा हादसा: गंगोत्री जा रहे यात्रियों का वाहन 200 मीटर गहरी खाई में…

12 hours ago

तेलंगाना : मछुआरों को बचाते समय SDRF की 2 नावें पलटीं, 10 जवान लापता

खम्मम में रेस्क्यू के दौरान बड़ा हादसा: बेथुपल्ली झील में SDRF की 2 नावें पलटीं,…

12 hours ago

श्रीगंगानगर रेलवे ट्रैक ब्लास्ट: NIA से लेकर ATS तक कर रही जांच

श्रीगंगानगर रेलवे ट्रैक ब्लास्ट: क्या किसी बड़े हमले का 'ट्रायल' था? ISI, ड्रोन और RDX…

12 hours ago