विचार प्रवाह : अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर भारत में मातम क्यों?
“खामेनेई की मौत पर भारत में शोक और विरोध पर उठे गंभीर सवाल, कश्मीर में अशांति और कांग्रेस की नीति पर निशाना “
श्रीनगर / नई दिल्ली (The Politics Again): संतोष सेठ की रिपोर्ट
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले में हुई मौत के बाद भारत के कुछ हिस्सों में जिस तरह का शोक और विरोध का माहौल बनाया जा रहा है, उसने कई गंभीर और चिंताजनक सवाल खड़े कर दिए हैं।
सवाल यह है कि आखिर एक ऐसे व्यक्ति की मौत पर भारत में हंगामा क्यों खड़ा किया जा रहा है, जो पिछले एक दशक से अधिक समय से बार-बार भारत के आंतरिक मामलों पर गैर-जरूरी और भड़काऊ टिप्पणियां करता रहा था?
कश्मीर घाटी में अशांति और तनाव
इस शोक और विरोध का सबसे गहरा असर कश्मीर घाटी में देखने को मिल रहा है, जहाँ लगातार छठे दिन जनजीवन प्रभावित है।
अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद यह पहली बार है जब घाटी में इतने बड़े पैमाने पर विरोध देखने को मिला है, जिससे हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। यह अशांति केंद्र सरकार के लिए एक नई चुनौती पेश कर रही है।
आंतरिक मामलों में दखल का इतिहास
सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत में आखिर किस बात का मातम मनाया जा रहा है? जिस खामेनेई को लेकर कुछ लोग यहाँ ‘छाती पीट’ रहे हैं, वही खामेनेई पिछले एक दशक से बार-बार भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करते रहे थे।
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2017: मुस्लिम देशों से कश्मीर के मुसलमानों का समर्थन करने की अपील।
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अगस्त 2019 (अनुच्छेद 370 के बाद): भारत को कश्मीर पर तथाकथित ‘न्यायपूर्ण नीति’ अपनाने की नसीहत, जिस पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई थी और ईरानी दूत को तलब किया था।
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जनवरी 2020 (नागरिकता संशोधन कानून): ईरान की संसद के अध्यक्ष ने इसे ‘मुस्लिम विरोधी’ बताया था, जिसे भारत ने अपने आंतरिक मामले में दखल करार दिया।
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फरवरी/मार्च 2020 (दिल्ली दंगे): खामेनेई ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि भारत को ‘चरमपंथी हिंदुओं’ का सामना करना चाहिए।
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उन्होंने दिल्ली दंगे के दौरान हिंसा को ‘मुसलमानों का नरसंहार’ बताया था और यहाँ तक कहा था कि भारत इस्लामी दुनिया से अलग-थलग पड़ सकता है।
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सितंबर 2024: खामेनेई ने एक पोस्ट में भारत को म्यांमार और गाजा के साथ जोड़ते हुए टिप्पणी की थी, जिस पर भारत सरकार ने उसे ‘गलत और अस्वीकार्य’ बताया था।
मातम मनाने वालों से सवाल
ऐसे व्यक्ति की मौत पर शोक मनाने वालों से सीधा सवाल है कि क्या उन्हें यह याद नहीं कि यही नेता भारत के खिलाफ लगातार बयान देता रहा था?
खामेनेई की मौत पर मातम मना रहे लोगों को क्या ईरान में महिलाओं पर कठोर नियंत्रण और वहाँ के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई कठोर दमनात्मक कार्रवाइयां भी दिखाई नहीं देतीं? क्या वे मानवाधिकारों के प्रति दोहरा मापदंड अपना रहे हैं?
कांग्रेस और सोनिया गांधी की नीति पर सवाल
यहाँ सवाल यह भी उठता है कि कांग्रेस संसदीय दल की चेयरपर्सन सोनिया गांधी आखिर किस नैतिक अधिकार से मोदी सरकार की ईरान नीति पर सवाल उठा रही हैं?
सोनिया गांधी को याद होना चाहिए कि साल 2005 से 2009 के बीच जब भारत अमेरिका के साथ नागरिक परमाणु समझौते पर बातचीत कर रहा था, तब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए (UPA) सरकार ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) में तीन बार ईरान के खिलाफ मतदान किया था।
आज जब वही दल केंद्र सरकार की नीति पर सवाल उठा रहा है, तब क्या उसे अपने पुराने फैसलों का जवाब नहीं देना चाहिए?
संतुलित आधिकारिक नीति
फिलहाल, भारत की आधिकारिक नीति पश्चिम एशिया में संतुलित दिखाई देती है। नई दिल्ली ने पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता की अपील दोहराई है और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया है।
लेकिन देश के भीतर जो भावनात्मक और राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आ रही है, उसने यह बहस तेज कर दी है कि आखिर भारत में खामेनेई के लिए किस कारण से मातम मनाया जा रहा है, और क्या यह राष्ट्रीय हित के विपरीत है?












