तुम्हारी फाइलों में मौसम गुलाबी है: दावों के विपरीत दिल्ली में गहराया LPG संकट | The Politics Again
‘तुम्हारी फाइलों में ये जो मौसम गुलाबी है, ये दावे फर्जी है और ये बातें सब किताबी हैं’: दावों से इतर देश में गहराया ऊर्जा संकट, दिल्ली में LPG के लिए मची त्राहिमाम “
नई दिल्ली (The Politics Again): संतोष सेठ की रिपोर्ट
मशहूर शायर अदम गोंडवी की पंक्तियां— “तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आँकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है” —आज देश के मौजूदा ऊर्जा संकट और एलपीजी (LPG) सप्लाई की जमीनी हकीकत पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं।
एक तरफ सरकार, पेट्रोलियम मंत्रालय और शीर्ष नेतृत्व लगातार यह भरोसा दिला रहे हैं कि मिडिल ईस्ट के युद्ध का भारत पर कोई असर नहीं है और तेल-गैस का पर्याप्त भंडार मौजूद है, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली जैसे महानगरों की सड़कों पर आम आदमी एक गैस सिलेंडर के लिए लंबी कतारों में खड़ा होने को मजबूर है।
फाइलों के ‘गुलाबी दावों’ और जमीन की ‘काली हकीकत’ के बीच का फासला लगातार बढ़ता जा रहा है।
दिल्ली में LPG की किल्लत: ‘ढाई दिन’ का दावा हवा-हवाई
देश की राजधानी दिल्ली में गैस किल्लत ने आम जनता की रसोई का बजट और सुकून दोनों बिगाड़ दिया है।
हाल ही में पेट्रोलियम मंत्रालय ने दावा किया था कि बुकिंग के मात्र ढाई (2.5) दिन में सिलेंडर घर पहुंच जाएगा।
लेकिन हकीकत यह है कि दिल्ली के कई इलाकों (जैसे रोहिणी, द्वारका, सीलमपुर और संगम विहार) में बुकिंग के हफ्तों बाद भी डिलीवरी नहीं हो रही है।
गैस एजेंसियों के बाहर लोगों की लंबी लाइनें लग रही हैं। सप्लाई चैन बाधित होने का सीधा असर यह हुआ है कि कई जगहों पर ‘पैनिक बाइंग’ (घबराहट में खरीदारी) शुरू हो गई है।
उपभोक्ता गैस एजेंसियों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ ‘स्टॉक खत्म है’ का बोर्ड देखने को मिल रहा है।
कालाबाजारी और आसमान छूती कीमतें
जब सिस्टम में कमी आती है, तो कालाबाजारी का जन्म होता है। प्रधानमंत्री ने भले ही राज्य सरकारों को जमाखोरों पर नकेल कसने के सख्त निर्देश दिए हों, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ब्लैक मार्केट सक्रिय हो चुका है।
जो घरेलू गैस सिलेंडर तय कीमत पर मिलना चाहिए, वह ब्लैक मार्केट में मनमाने दामों पर बेचा जा रहा है।
व्यावसायिक सिलेंडरों (Commercial Cylinders) की कमी के चलते छोटे रेस्टोरेंट और ढाबे वालों का रोजगार संकट में आ गया है।
‘सुरक्षित सप्लाई चैन’ के दावों पर सवाल
सरकार का कहना है कि भारत 40 देशों से कच्चा तेल मंगाता है और ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ के अलावा अन्य रास्ते खुले हैं।
लेकिन अगर समुद्र में भारतीय जहाज सुरक्षित हैं और देश में तेल-गैस आ रहा है, तो फिर डिपो से लेकर गैस एजेंसियों और एजेंसियों से लेकर आम आदमी की रसोई तक गैस क्यों नहीं पहुंच रही?
विपक्ष भी लगातार इस मुद्दे को उठा रहा है और संसद परिसर में विरोध प्रदर्शन कर चुका है।
जनता पूछ रही है कि अगर सब कुछ “नियंत्रण” में है, तो उन्हें गैस के लिए दर-दर क्यों भटकना पड़ रहा है?
निष्कर्ष: फाइलों से बाहर आने की जरूरत
वैश्विक संकट अपनी जगह है, लेकिन देश के भीतर वितरण प्रणाली (Distribution System) का इस तरह चरमरा जाना सरकारी दावों की पोल खोलता है।
सरकार को अब प्रेस कॉन्फ्रेंस और आंकड़ों की फाइलों से बाहर निकलकर, दिल्ली और देश के अन्य शहरों की उन कतारों को देखना होगा, जहां एक आम आदमी अपनी रोजमर्रा की ऊर्जा जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है।
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