Actor Vijay TVK

तमिलनाडु चुनाव 2026 : ‘थलापति’ विजय बने राज्य के मुधलवन

‘थलापति’ से ‘मुधलवन’ तक: कैसे एक ‘साइलेंट वारियर’ ने ढहाया द्रविड़ राजनीति का किला, तमिलनाडु में विजय ने रचा इतिहास”

चेन्नई: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने भारतीय राजनीति में एक ऐसा अध्याय लिख दिया है, जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक किसी ने नहीं की थी।

जब सुपरस्टार जोसेफ विजय ने अपनी राजनीतिक पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कषगम’ (TVK) की स्थापना की थी, तो कई राजनीतिक विश्लेषकों ने उन्हें DMK और AIADMK जैसे द्रविड़ दिग्गजों के सामने बेहद कमतर आंका था।

लेकिन आज, 51 वर्षीय विजय न केवल सिनेमा के एक ‘मेगास्टार’ बल्कि तमिलनाडु के नए ‘मुधलवन’ (मुख्यमंत्री) के रूप में उभरकर सामने आए हैं।

पारंपरिक राजनीति को मात, ‘विजय मामा’ का चला जादू

विजय की सफलता का सबसे बड़ा कारण उनका चुनाव प्रचार रहा, जो पारंपरिक राजनीति से बिल्कुल अलग था।

जहाँ अन्य दल बड़ी-बड़ी रैलियों और रोड-शो पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहे थे, वहीं विजय ने एक ‘साइलेंट वारियर’ की तरह काम किया।

उन्होंने न तो कोई बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस की और न ही टीवी इंटरव्यू दिए। उनका पूरा फोकस सीधे सोशल मीडिया के जरिए जनता से जुड़ने पर रहा।

सबसे दिलचस्प रणनीति रही बच्चों और किशोरों को अपना ‘नानबा’ (दोस्त) बनाना। विजय ने चुनाव प्रचार के दौरान खुद को “विजय मामा” के रूप में पेश किया।

जब मतदान 85 फीसदी के पार गया, तो उन्होंने खास तौर पर “कुट्टी, नानबा, नानबी” (बच्चों और दोस्तों) को संबोधित कर आभार जताया।

इन बच्चों ने ही अपने माता-पिता को TVK के पक्ष में मतदान करने के लिए सबसे ज्यादा प्रेरित किया।

साधारण कदमों से पैदा किया असाधारण भावनात्मक जुड़ाव

विजय ने हमेशा लीक से हटकर कदम उठाए। कभी वे अचानक साइकिल उठाकर तंग गलियों में निकल जाते, तो कभी फिल्म समारोहों के मंच से सरल लेकिन गहरे अर्थों वाली कहानियां सुनाते।

दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता की तरह कहानियां सुनाने और एम. करुणानिधि की तरह खास वाक्यांशों के इस्तेमाल ने उन्हें सीधे जनता के दिलों से जोड़ दिया।

उनका पसंदीदा संबोधन— ‘एन नेनजिल कुडियिरुक्कुम…नानबा, नानबी’ (दोस्तों, आप मेरे दिल में रहते हैं) तमिलनाडु की राजनीति का नया नारा बन गया।

फिल्मी पर्दे पर ही लिख दी थी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पटकथा

लगभग 25-30 साल पहले शर्मीले स्वभाव वाले विजय को देखकर किसी ने नहीं सोचा था कि वे मुख्यमंत्री बनेंगे।

1994 में उनकी फिल्म ‘रसिगन’ के दौरान उन्हें ‘इलैया थलापति’ (युवा कमांडर) के रूप में पेश किया गया था, जो बाद में निर्विवाद रूप से ‘थलापति’ बन गया।

विजय ने अपनी राजनीतिक जमीन फिल्मों के जरिए ही तैयार कर ली थी:

  • 2011: दिल्ली में अन्ना हजारे के अनशन में शामिल होकर राजनीतिक सुगबुगाहट तेज की।

  • 2013: फिल्म ‘थलाइवा’ (टैगलाइन- पैदाइशी नेता) ने उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का पहला बड़ा संकेत दिया।

  • 2014: ‘कत्थी’ फिल्म में किसानों के मुद्दे उठाकर वे जनता के मसीहा बने।

  • 2017: ‘मर्सल’ में जीएसटी (GST) की आलोचना कर उन्होंने राजनीतिक विवाद मोल लिया।

  • 2018: ‘सरकार’ फिल्म में चुनावी राजनीति और धोखाधड़ी पर सीधा प्रहार किया और उसी साल थूथुकुडी पुलिस गोलीबारी के पीड़ितों को 1-1 लाख रुपये की मदद दी।

द्रविड़ विचारधारा और तमिल राष्ट्रवाद का सटीक संगम

विजय ने बहुत ही चतुराई से द्रविड़ विचारधारा और तमिल राष्ट्रवाद के तत्वों को मिलाकर TVK की विचारधारा तैयार की।

उन्होंने 2021 के स्थानीय निकाय चुनावों में ही ‘विजय मक्कल इयक्कम’ (VMI) के बैनर तले अपने प्रशंसकों की जीत से सियासत में अपनी दमदार एंट्री की नींव रख दी थी।

अपनी करिश्माई शख्सियत, दृढ़ विश्वास और “मैं इंतजार कर रहा हूं” जैसे आइकोनिक संवादों के असल जीवन में क्रियान्वयन ने साबित कर दिया है कि राजनीति के इस कठिन रास्ते पर विजय अब सिर्फ एक ‘थलापति’ (कमांडर) नहीं, बल्कि एक परिपक्व ‘थलाइवन’ (नेता) और ‘मुधलवन’ हैं।

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