RSS Role in Bengal

बंगाल में ‘कमल’ खिलने के पीछे RSS की मौन साधना !

बंगाल में ‘कमल’ खिलने के पीछे RSS की मौन साधना: 2 लाख बैठकें और ‘निर्भीक मतदान’ अभियान से पलटी बाजी”

कोलकाता: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में साल 2026 एक बड़े और ऐतिहासिक राजनीतिक उलटफेर के गवाह के रूप में दर्ज हो रहा है।

ममता बनर्जी के 15 साल पुराने ‘तृणमूल किले’ को ढहाने में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को जो प्रचंड सफलता मिलती दिख रही है, उसके पीछे केवल राजनीतिक रैलियां नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की मौन साधना और वर्षों का जमीनी संघर्ष है।

रात 8 बजे तक के आधिकारिक चुनाव परिणामों और रुझानों के अनुसार, 294 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा 107 सीटें जीत चुकी है और 99 अन्य सीटों पर निर्णायक बढ़त बनाए हुए है।

जमीनी स्तर पर 2 लाख बैठकें और ‘निर्भीक मतदान’ का मंत्र

भाजपा की इस बड़ी जीत को सुनिश्चित करने के लिए संघ ने चुनाव से महीनों पहले ही एक सूक्ष्म और व्यापक अभियान छेड़ दिया था।

सूत्रों के अनुसार, चुनावों के दौरान RSS स्वयंसेवकों ने बड़े पैमाने पर मतदाता जागरूकता अभियान चलाया। इसके तहत राज्य भर में छोटे-छोटे समूहों में लगभग दो लाख बैठकें की गईं।

संघ के एक सूत्र ने बताया, “इन बैठकों के दौरान आम जनता को स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों से अवगत कराया गया।

बंगाल की चुनावी हिंसा के इतिहास को देखते हुए मतदाताओं को ‘निर्भीक होकर मतदान’ करने के लिए प्रोत्साहित किया गया और उन्हें सुरक्षा का पूरा आश्वासन दिया गया।”

इसके अलावा, स्वयंसेवकों ने जमीनी स्तर पर लोगों की नब्ज़ टटोली और जनता के मिजाज व प्रतिद्वंद्वियों की चाल के बारे में भाजपा को सटीक इनपुट दिए, जिससे पार्टी को अपनी रणनीति धारदार बनाने में मदद मिली।

2021 की चुनाव बाद की हिंसा से शुरू हुई थी तैयारी

पश्चिम बंगाल में भाजपा के उभार की नींव 2021 के विधानसभा चुनावों के तुरंत बाद ही रख दी गई थी, जब भाजपा 3 सीटों (2016) से बढ़कर 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल बनी थी। 2021 में तृणमूल कांग्रेस की जीत के बाद राज्य में भयंकर राजनीतिक हिंसा हुई थी।

संघ के एक अन्य सूत्र ने उस दौर को याद करते हुए कहा, “हिंसा में कई कार्यकर्ता मारे गए थे, लेकिन हम रुके नहीं। हमने अपना काम जारी रखा।”

संघ और पार्टी के कार्यकर्ताओं ने हिंसा पीड़ितों को राहत दिलाने के लिए दिन-रात काम किया। उन्हें कानूनी सलाह दी गई, मुआवजा दिलाया गया।

क्षतिग्रस्त घरों का पुनर्निर्माण कराया गया और उनकी आजीविका का भी ध्यान रखा गया। इसी सेवा भाव ने जमीनी स्तर पर जनता का गहरा विश्वास जीता।

भाजपा नेताओं ने माना संघ का लोहा

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन की इस पटकथा में भाजपा और संघ के बीच अद्भुत समन्वय देखने को मिला।

राज्य में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी का किला ढहाने में आरएसएस स्वयंसेवकों के इस विशाल योगदान को खुद भाजपा आलाकमान भी स्वीकार कर रहा है।

एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने इस सफलता पर कहा, “उन्होंने (संघ के स्वयंसेवकों ने) वास्तव में बहुत मेहनत की है। हमने जमीनी स्तर पर दिन-रात एक कर दिया और जनता तक अपना सही संदेश पहुंचाया।”

यह स्पष्ट है कि रैलियों के शोर-शराबे से दूर, आरएसएस की इस खामोश रणनीति और मजबूत जनसंपर्क ने ही बंगाल में ‘कमल’ खिलने का मार्ग प्रशस्त किया है।

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