फार्मा हब पर ‘रिवाइज्ड शेड्यूल-एम’ का चाबुक: 25 इकाइयों में उत्पादन ठप, 80 को नोटिस
“राज्य में दवा गुणवत्ता मानकों को लेकर केंद्र सख्त; केवल 116 इकाइयां ही कर पाईं नए नियमों का पूर्ण अनुपालन”
[ब्यूरो रिपोर्ट | शिमला/सोलन]
केंद्र सरकार द्वारा दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए लागू किए गए ‘रिवाइज्ड शेड्यूल-एम’ (Revised Schedule-M) का असर अब प्रदेश के फार्मा उद्योग पर कहर बनकर टूट रहा है।
नए मानकों को लेकर अपनाए गए सख्त रवैये के चलते राज्य की 25 फार्मास्यूटिकल इकाइयों में उत्पादन पूरी तरह ठप हो गया है, जबकि 80 से अधिक इकाइयों को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया है।
औषधि नियंत्रण विभाग की इस बड़ी कार्रवाई से दवा निर्माताओं में हड़कंप मचा हुआ है। विभाग द्वारा अब तक 90 दवा निर्माण इकाइयों का औचक निरीक्षण किया गया है, जिनमें से चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं—मात्र 10 इकाइयां ही नए मानकों पर खरी उतर पाई हैं।
निरीक्षण में खुली पोल: कहीं खामियां, कहीं डर
विभाग ने नवंबर 2025 से उन करीब 370 इकाइयों के खिलाफ सघन अभियान छेड़ा था, जिन्होंने तय समयसीमा में अपने संयंत्रों (Plants) के अपग्रेडेशन के लिए आवेदन नहीं किया था। विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, जिन 25 इकाइयों में कामकाज बंद हुआ है, उनकी स्थिति इस प्रकार है:
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10 इकाइयां: निरीक्षण के दौरान गंभीर खामियां मिलने पर विभाग ने सीधे ‘स्टॉप प्रोडक्शन’ (उत्पादन रोक) के आदेश जारी किए।
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05 इकाइयां: सख्त नियमों के दबाव में स्वेच्छा से अपने लाइसेंस सरेंडर कर दिए।
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03 इकाइयां: संभावित कार्रवाई के डर से खुद ही उत्पादन रोक दिया।
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07 इकाइयां: अपग्रेडेशन का हवाला देकर अस्थायी रूप से काम बंद किया है।
क्या है रिवाइज्ड शेड्यूल-एम?
वर्ष 2022 में अधिसूचित किए गए संशोधित शेड्यूल-एम का उद्देश्य दवा निर्माण में अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता (GMP) लाना है। इसके तहत अब दवा कंपनियों के लिए निम्नलिखित प्रावधान अनिवार्य हैं:
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फार्मास्युटिकल क्वालिटी सिस्टम (PQS): पूरी प्रक्रिया की गुणवत्ता निगरानी।
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क्वालिटी रिस्क मैनेजमेंट (QRM): जोखिमों का पहले से आकलन।
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उत्पाद रिकॉल सिस्टम: बाजार से खराब दवाओं को तुरंत वापस लेने की क्षमता।
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उपकरण वैलिडेशन: मशीनों की सटीकता की नियमित जांच।
“मरीजों की जान से समझौता नहीं”
राज्य औषधि नियंत्रक डा. मनीष कपूर ने स्पष्ट किया कि यह पूरी कार्रवाई केंद्र सरकार के सख्त निर्देशों के अनुरूप की जा रही है। उन्होंने कहा, “दवाओं की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। मानकों के साथ किसी भी तरह का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जो इकाइयां नियमों का पालन नहीं करेंगी, उन पर विधि सम्मत कार्रवाई जारी रहेगी।”
उद्योग का दर्द: एमएसएमई को चाहिए राहत
दूसरी ओर, हिमाचल ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने सरकार से थोड़ी नरमी बरतने की अपील की है। एसोसिएशन के प्रवक्ता संजय शर्मा का कहना है, “प्रदेश की कई एमएसएमई (MSME) इकाइयां अभी अपग्रेडेशन की प्रक्रिया में हैं। नए मानकों के अनुरूप प्लांट को तैयार करने में 2 से 3 करोड़ रुपये का बड़ा निवेश लगता है। जो इकाइयां सुधार के लिए आवेदन कर चुकी हैं, उन्हें समय सीमा में राहत मिलनी चाहिए।”
आंकड़ों में स्थिति
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655: राज्य में कुल दवा निर्माण इकाइयां।
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116: केवल इतनी ही इकाइयां अब तक पूर्ण अनुपालन कर पाई हैं।
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370: इकाइयां रडार पर हैं, जिनका सघन निरीक्षण जारी है।
आने वाले दिनों में निरीक्षण और तेज होने की संभावना है। यह कार्रवाई स्पष्ट संदेश देती है कि भारतीय फार्मा सेक्टर को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढलना ही होगा, चाहे इसकी कीमत छोटी इकाइयों के अस्तित्व पर ही क्यों न आए।











