“हे! राजनीति के धुरंधरों, रहम करो…” – क्या सत्ता के लिए समाज को बांटना जरूरी है? प्रो. अखिलेश्वर शुक्ला का सीधा सवाल
“77वें गणतंत्र दिवस पर विशेष: संविधान में 106 संशोधन हो गए, पर हमारी मानसिकता कब बदलेगी? जाति और धर्म की राजनीति पर पूर्व प्राचार्य का प्रहार “
लेखक: प्रोफेसर (कैप्टन) डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला (पूर्व प्राचार्य/विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान, राजा श्री कृष्ण दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर)
हम सभी भारतीय 77वें गणतंत्र दिवस को हर्षोल्लास के साथ मना रहे हैं। हमारा संविधान, जो ब्रिटिश संसद द्वारा पारित “भारतीय शासन अधिनियम 1935” के मूल ढांचे पर आधारित है, उसे संविधान सभा के 229 निर्वाचित और 70 मनोनीत सदस्यों ने 22 समितियों के गहन चिंतन और दुनिया भर के संविधानों के अध्ययन के बाद तैयार किया था।
आज इस संविधान को 106 संशोधनों से गुजरना पड़ा है। तर्क यह दिया जाता है कि समय के साथ ‘बदलाव’ जरूरी है। लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि—हम कब बदलेंगे?
जब भी पारिवारिक या सामाजिक समस्या आती है, हम तुरंत ‘विकास’ और ‘आधुनिकीकरण’ की दुहाई देते हैं और सोच बदलने की बात करते हैं।
लेकिन अफसोस, हमारे राजनीतिक दलों और नेताओं को भारतीय समाज को जोड़ने वाली प्राथमिकताओं के बजाय ‘तोड़ने वाली व्यवस्थाएं’ ज्यादा रास आती हैं।
रोटी, मोबाइल और नारों का मायाजाल
अपने पसंदीदा नारों (Slogans) के बल पर जन-सामान्य को रिझाने की कला में हमारे नेता माहिर हैं। वे यह बखूबी जानते हैं कि भारतीय जनता को अगर केवल भरपेट खाना और सोने को मिलता रहे, और हाथ में एक ‘मोबाइल’ हो, तो वह शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों को भूल जाएगी।
नेताओं को लगता है कि उनका लक्ष्य “सबका साथ, सबका विकास” जैसे नारों से पूरा हो चुका है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से देश की जनता ऐसे ही लोक-लुभावन नारों के सहारे राजनीतिक दलों को समर्थन और सत्ता सौंपती आ रही है।
बाबा साहेब ने यह तो नहीं सोचा था?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में ‘समानता के अधिकार’ की बात कही गई है। इसका मूल उद्देश्य है—कानून के समक्ष समानता और भेदभाव का निषेध।
यह सच है कि 1947 में हमारी अर्थव्यवस्था औपनिवेशिक शोषण के कारण पिछड़ी थी और 75% आबादी कृषि पर निर्भर थी।
तब पिछड़े वर्ग को आगे बढ़ाने की जरूरत थी। लेकिन क्या बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने कभी सोचा होगा कि इस पिछड़े वर्ग को आगे बढ़ाने के बजाय, इसका इस्तेमाल केवल ‘सत्ता सुख’ प्राप्ति के साधन (Vote Bank) के रूप में किया जाएगा?
आज देश के महत्वपूर्ण पदों पर पिछड़ी जातियों का होना गौरव की बात है। लेकिन सामाजिक कटुता, दुराव और मनमुटाव को बढ़ावा देने वाले नियम-कानून लागू करने से न रोजगार सृजन होगा, न ही सामाजिक समरसता आएगी।
हाँ, इतना जरूर होगा कि छल-कपट और प्रपंच करने वाले राजनीति के धुरंधरों के लिए सत्ता पाने का रास्ता आसान हो जाएगा।
खंड-खंड होता समाज और हमारी संतति
राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने आज समाज को खंड-खंड कर दिया है। संयुक्त परिवारों से लेकर सामाजिक और व्यापारिक गतिविधियां तक अस्त-व्यस्त हो चुकी हैं। जहां ‘राष्ट्र धर्म’ की बात होनी चाहिए, वहां भी नेता धर्म पर राजनीतिक प्रभाव जमाने में मशगूल हैं।
आज अगर भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है, तो यह केवल हमारी बौद्धिक संपदा, ज्ञान-विज्ञान, पूर्वजों के संस्कार और ‘अनेकता में एकता’ के कारण है।
इसे बनाए रखने के लिए हमें समाज को तोड़ने वाली तमाम व्यवस्थाओं का सामूहिक विरोध करना होगा।
निष्कर्ष: हम एक रहेंगे, तो नेक रहेंगे
यह जरूरी है कि समाज में जो भी कमजोर है, आर्थिक तंगी का सामना कर रहा है (चाहे वह किसी भी वर्ग का हो), उसकी तरक्की के लिए हम सामाजिक सौहार्द के साथ प्रयास करें।
लेकिन दोहरे मापदंड के शिकार लोग, जो समान आचार संहिता की बात तो करते हैं पर समाज में विद्वेष फैलाने वालों को प्रश्रय देते हैं, उन्हें समझना होगा। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो हमारी आने वाली संतति (पीढ़ियां) हमें सदैव कोसती रहेंगी।
इसलिए मेरा आह्वान है— “रहम करो! हम भारतीय एक रहेंगे, तो नेक रहेंगे।”
भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता की जय हो! जय हिन्द, जय भारत! 🚩🌹











