दशकों से बिना नियमित वेतन के काम कर रहे वित्तविहीन माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों ने जौनपुर कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया और मुख्यमंत्री के नाम डीएम को ज्ञापन सौंपकर मासिक मानदेय की मांग की।
जौनपुर: दशकों से बिना वेतन पढ़ा रहे वित्तविहीन शिक्षकों का कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन, DM को सौंपा ज्ञापन; जानें क्या हैं मांगें”
जौनपुर: द पॉलिटिक्स अगेन : वरुण यादव की रिपोर्ट
दशकों से बिना किसी नियमित वेतन के अपनी शैक्षणिक सेवाएं दे रहे वित्तविहीन माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों और कर्मचारियों के सब्र का बांध आखिरकार टूट गया।
शुक्रवार दोपहर 2 बजे बड़ी संख्या में वित्तविहीन शिक्षकों ने जौनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में जोरदार प्रदर्शन किया।
प्रदर्शनकारी शिक्षकों ने अपनी लंबित मांगों और आर्थिक संकट को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम संबोधित एक ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपा और जल्द से जल्द न्याय की गुहार लगाई।
प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि 15 अक्टूबर 1986 के अध्यादेश में ‘वित्तविहीन व्यवस्था’ को केवल दो साल के लिए एक ‘प्रयोगात्मक (Experimental) रूप’ में लागू किया गया था। लेकिन दुर्भाग्यवश, सरकारों की अनदेखी के कारण यह व्यवस्था आज तक लागू है।
इस व्यवस्था के कारण प्रदेश भर के हजारों शिक्षक और कर्मचारी बिना नियमित वेतन के काम करने को मजबूर हैं, जिससे उनके सामने परिवार पालने और गंभीर आर्थिक संकट की स्थिति पैदा हो गई है।
शिक्षकों ने बताया कि वर्ष 2016-17 में तत्कालीन प्रदेश सरकार ने वित्तविहीन शिक्षकों के जीविकोपार्जन के लिए मासिक मानदेय के रूप में 200 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया था।
लेकिन 12 सितंबर 2016 को जारी हुए शासनादेश के तहत जो वितरण नीति लागू की गई, उसमें इतनी खामियां थीं कि जरूरतमंद शिक्षकों को इस बजट का कोई अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका।
शिक्षकों का आरोप है कि शासन स्तर पर कई बार ज्ञापन और प्रत्यावेदन देने के बावजूद जब कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्होंने उच्च न्यायालय (High Court) की लखनऊ खंडपीठ का दरवाजा खटखटाया।
इस मामले में याचिका (संख्या 21635/2021) पर 19 जुलाई 2023 को हाईकोर्ट अपना आदेश भी पारित कर चुका है।
लेकिन विडंबना यह है कि एक साल से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी सरकार द्वारा उस आदेश का प्रभावी अनुपालन नहीं कराया गया है।
ज्ञापन के माध्यम से मुख्यमंत्री से निम्नलिखित मांगें की गई हैं:
तत्काल मानदेय: शिक्षकों और कर्मचारियों के जीविकोपार्जन के लिए तत्काल प्रभाव से सम्मानजनक मासिक मानदेय लागू किया जाए।
अनुदान सूची में वापसी: 1986 के मूल अध्यादेश के अनुरूप वित्तविहीन विद्यालयों को पुनः ‘सरकारी अनुदान सूची’ (Grant-in-Aid) में शामिल किया जाए।
सेवा शर्तों का निर्धारण: इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम, 1921 की धारा 16(च) और 16(छ) के तहत इन शिक्षकों की सेवा शर्तों का स्पष्ट निर्धारण सुनिश्चित किया जाए।
समान सुविधाएं: वित्तविहीन शिक्षकों को भी नियमित शिक्षकों के समान चिकित्सा सुविधा, सामाजिक सुरक्षा और अन्य सभी वैधानिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
शिक्षकों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द विचार नहीं किया गया, तो वे अपने आंदोलन को और तेज करने के लिए मजबूर होंगे।
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