Rare Earth Permanent Magnet Scheme
“मोबाइल फोन से लेकर फाइटर जेट और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बैटरियों तक—दुनिया जिस ‘फ्यूल’ पर चल रही है, उसका एक बड़ा खजाना भारत के पास मौजूद है”
नई दिल्ली “The Politics Again” संतोष सेठ की रिपोर्ट
केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने राज्यसभा में खुलासा किया कि भारत के पास तटीय और कठोर चट्टानी इलाकों में दुर्लभ मृदा खनिजों (Rare Earth Elements – REE) के विशाल भंडार हैं।
सरकार ने साफ कर दिया है कि अब केवल खोज नहीं, बल्कि ‘माइनिंग टू मैग्नेट’ (Mining to Magnet) की रणनीति पर काम होगा। इसका सीधा मकसद वैश्विक सप्लाई चेन में चीन के एकाधिकार को तोड़ना है।
कहाँ छिपा है यह खजाना? (AMD की रिपोर्ट)
परमाणु खनिज निदेशालय (AMD) के ताजा आंकड़ों (28 जनवरी 2026 तक) के अनुसार:
तटीय क्षेत्र: तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात, झारखंड और पश्चिम बंगाल के समुद्री तटों और रेत में 13.15 मिलियन टन मोनाजाइट (Monazite) का भंडार है। इसमें करीब 7.23 मिलियन टन दुर्लभ मृदा ऑक्साइड मौजूद है।
कठोर चट्टानें: राजस्थान और गुजरात की चट्टानों में भी 1.29 मिलियन टन दुर्लभ मृदा ऑक्साइड के संसाधन मिले हैं।
चुनौती और समाधान: रेडियोएक्टिविटी और तकनीक
मंत्री रेड्डी ने स्वीकार किया कि भारतीय मोनाजाइट में यूरेनियम और थोरियम जैसे रेडियोधर्मी तत्व होते हैं, जिससे इसका निष्कर्षण (Extraction) जटिल और महंगा है।
लेकिन अब MMDR संशोधन अधिनियम, 2023 के जरिए निजी क्षेत्र के लिए दरवाजे खोल दिए गए हैं।
सरकार ने अब तक दुर्लभ मृदा तत्वों सहित 46 महत्वपूर्ण खनिज ब्लॉकों की सफल नीलामी कर दी है।
गेम चेंजर: ₹7,280 करोड़ का ‘मैग्नेट प्लान’
महज कच्चा माल निकालने से काम नहीं चलेगा, इसलिए सरकार ने नवंबर 2025 में “सिंटर्ड दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबक विनिर्माण योजना” को मंजूरी दी है।
बजट: ₹7,280 करोड़।
लक्ष्य: भारत में सालाना 6,000 मीट्रिक टन स्थायी चुंबक (Permanent Magnets) बनाना।
असर: इससे भारत दुनिया के REPM (Rare Earth Permanent Magnet) बाजार में एक बड़ा खिलाड़ी बनेगा, जिसका सीधा फायदा EV और डिफेंस सेक्टर को होगा।
मिशन मोड: नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन (NCMM)
29 जनवरी 2025 को कैबिनेट ने NCMM की स्थापना को मंजूरी दी है। इसका काम खनिज निकालने से लेकर उसकी रिसाइकिलिंग तक पूरी ‘वैल्यू चेन’ को भारत में ही स्थापित करना है।
इसके लिए वन मंजूरी और जन-सुनवाई (Public Hearing) जैसे नियमों में बड़ी ढील दी गई है ताकि प्रोजेक्ट्स में देरी न हो।
🧐 आसान भाषा में: क्या हैं ‘दुर्लभ मृदा खनिज’ और ये इतने कीमती क्यों हैं?
हम अक्सर ‘Rare Earth Elements’ (REE) या दुर्लभ मृदा खनिजों के बारे में सुनते हैं, लेकिन ये असल में हैं क्या?
क्या ये सच में दुर्लभ (Rare) हैं? जी नहीं! ये खनिज पृथ्वी पर पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। इन्हें ‘दुर्लभ’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये शुद्ध रूप में नहीं मिलते और इन्हें अन्य तत्वों से अलग करना (Extract करना) बेहद कठिन और महंगा होता है।
ये 17 तत्व हैं: इसमें 17 रासायनिक तत्व शामिल हैं (जैसे- लैंथेनम, सीरियम, नियोडिमियम आदि)।
दैनिक जीवन में उपयोग:
आपका स्मार्टफोन: स्क्रीन के रंग, स्पीकर और वाइब्रेशन के लिए।
इलेक्ट्रिक वाहन (EV): मोटर में लगने वाले शक्तिशाली चुंबक (Magnets) इन्हीं से बनते हैं।
रक्षा (Defense): मिसाइल गाइडेंस सिस्टम, रडार, और फाइटर जेट्स के इंजन।
क्लीन एनर्जी: विंड टरबाइन (पवन चक्की) के लिए।
भारत के लिए गेम चेंजर क्यों?
आज की दुनिया ‘तेल’ से ज्यादा इन ‘खनिजों’ पर निर्भर होती जा रही है। जिसके पास इनका भंडार और तकनीक होगी, वही भविष्य की अर्थव्यवस्था को कंट्रोल करेगा। भारत का ‘मैग्नेट मिशन’ इसी दिशा में एक बड़ी छलांग है।
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