नेपाल की विनाशकारी बाढ़ से सबक लेते हुए, केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने हिमालयी राज्यों के साथ GLOF और हिमस्खलन के खतरों से निपटने के लिए उच्चस्तरीय बैठक की।
नेपाल में 1000 मौतों से दहला हिमालय: भारत सरकार अलर्ट; गृह सचिव ने हिमालयी राज्यों के साथ की GLOF और हिमस्खलन पर हाई-लेवल मीटिंग”
नई दिल्ली : श्रीमती शिल्पा , THE POLITICS AGAIN
नेपाल और तिब्बत सीमा पर हाल ही में ग्लेशियर फटने और भयानक जल प्रलय (फ्लैश फ्लड) से 1,000 से अधिक लोगों की मौत ने पूरे दक्षिण एशिया में खतरे की घंटी बजा दी है।
इस विनाशकारी आपदा के बाद, भारत सरकार पूरी तरह सतर्क हो गई है। केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन की अध्यक्षता में नई दिल्ली में हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की एक उच्चस्तरीय रणनीतिक बैठक आयोजित की गई।
बैठक का मुख्य फोकस ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और हिमस्खलन (Avalanche) के बढ़ते खतरों से निपटने की रणनीति पर था।
इस महत्वपूर्ण बैठक में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिवों ने हिस्सा लिया।
इसके अलावा गृह मंत्रालय, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), केंद्रीय जल आयोग, मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान के शीर्ष अधिकारी भी मौजूद रहे।
अगस्त के अंत में नेपाल के लांगटांग क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टानों का एक बड़ा हिस्सा ढह गया था, जिससे बर्फ, पानी और मलबे ने एक भयानक फ्लैश फ्लड का रूप ले लिया।
वैज्ञानिकों का स्पष्ट मानना है कि बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पिघलने और पर्माफ्रॉस्ट के कमजोर होने से ऊंचाई वाले पर्वतीय ढलान बेहद अस्थिर हो गए हैं।
चीन-तिब्बत क्षेत्र में हो रहे विशाल जलविद्युत विकास (जैसे यारलुंग जांगबो पर बन रहा डैम) और बड़े पैमाने पर हो रहे निर्माण कार्यों ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है।
भारत के लिए यह खतरा नया नहीं है; 2023 की सिक्किम आपदा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। इस खतरे से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने 2024 में अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और उत्तराखंड के लिए 150 करोड़ रुपये की राष्ट्रीय GLOF जोखिम शमन परियोजना को मंजूरी दी थी।
सक्रिय निगरानी: संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों की उपग्रह और जमीनी आंकड़ों के जरिए निरंतर निगरानी की जाए।
अर्ली वार्निंग सिस्टम: प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) को मजबूत किया जाए ताकि खतरे की सूचना अंतिम व्यक्ति तक तुरंत पहुंच सके।
शमन और निकासी: जल-प्रवाह मार्गों (वाटर फ्लो चैनल्स) की पहचान हो और आपदा के समय सुरक्षित निकासी की योजनाएं पूरी तरह व्यावहारिक हों।
निष्कर्ष: राहत नहीं, बचाव पर जोर बैठक का स्पष्ट संदेश है कि हिमालयी आपदाओं का मुकाबला केवल घटना के बाद राहत पहुंचाकर नहीं किया जा सकता।
यह समय पूर्वानुमान, रोकथाम और अंतर-एजेंसी समन्वय का है। हिमालय अब सिर्फ भारत की सुंदरता का प्रतीक नहीं, बल्कि देश और पूरे दक्षिण एशिया की जल, ऊर्जा, पर्यावरण और मानव सुरक्षा का सबसे बड़ा और संवेदनशील केंद्र बन चुका है।
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