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एआई की सुनामी: ‘Claude Cowork’ के खौफ से भारतीय आईटी सेक्टर में हाहाकार, निवेशकों के 1.5 लाख करोड़ रुपये स्वाहा

“भारतीय आईटी सेक्टर के लिए पिछला हफ्ता किसी बुरे सपने जैसा साबित हुआ है”

नई दिल्ली/बिजनेस डेस्क: “The Politics Again” संतोष सेठ की रिपोर्ट 

देश की शीर्ष 5 आईटी कंपनियों ने बाज़ार में भारी गिरावट देखी, जिससे निवेशकों की करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति एक झटके में डूब गई।

इस तबाही की वजह कोई आर्थिक मंदी नहीं, बल्कि अमेरिका की एक एआई कंपनी ‘एंथ्रोपिक’ (Anthropic) और उसका नया प्रोडक्ट ‘क्लाउड कोवर्क’ (Claude Cowork) है।

महज 2,500 कर्मचारियों वाली इस कंपनी ने लाखों कर्मचारियों वाली दिग्गज आईटी कंपनियों की नींद उड़ा दी है।

क्या हुआ 5 फरवरी को?

एंथ्रोपिक ने अपना एआई टूल ‘Claude Cowork’ वैसे तो 12 जनवरी को ही लॉन्च कर दिया था, लेकिन बाजार पर इसका असली असर तब दिखा जब कंपनी ने इसके 11 बिजनेस प्लग-इन्स की घोषणा की।

इन प्लग-इन्स के जरिए आईटी कंपनियों के काम को पूरी तरह ऑटोमेट करने की क्षमता सामने आते ही निवेशकों का धैर्य जवाब दे गया।

5 फरवरी को टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) और इंफोसिस (Infosys) जैसी दिग्गज कंपनियों के शेयर 7 प्रतिशत तक टूट गए। अमेरिका में भी इस एआई के डर से निवेशकों के करीब 1 ट्रिलियन डॉलर डूबने की खबर है।

चैटबॉट नहीं, यह ‘डिजिटल सहकर्मी’ है

तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, Claude Cowork, बाज़ार में मौजूद ChatGPT या Gemini जैसे सामान्य चैटबॉट्स से कोसों आगे है।

जहाँ सामान्य एआई एक फ्रीलांसर की तरह काम करता है (जिसे आप निर्देश देते हैं और वह जानकारी देता है), वहीं ‘कोवर्क’ आपके कंप्यूटर सिस्टम में घुसकर एक जूनियर स्टाफ की तरह काम करता है।

यह टूल खुद कोडिंग कर सकता है, मार्केटिंग संभाल सकता है और लीगल या अकाउंटिंग कार्यों को बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के पूरा कर सकता है।

‘सास-पॉकलिप्स’ (SaaS-pocalypse) का खतरा

बाजार के जानकारों ने इस स्थिति को ‘सास-पॉकलिप्स’ यानी सॉफ्टवेयर बिजनेस का महाप्रलय करार दिया है।

अमेरिका में ‘सॉफ्टवेयर एज ए सर्विस’ (SaaS) कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। डर यह है कि जब एआई खुद सॉफ्टवेयर बना सकता है और उसे मेंटेन भी कर सकता है, तो कोई कंपनियों को भारी-भरकम फीस क्यों देगा?

भारत के लिए खतरे की घंटी क्यों?

भारतीय आईटी कंपनियों का बिजनेस मॉडल मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और उससे भी ज्यादा ‘मेंनटेनेंस’ (रखरखाव) पर टिका है, जहाँ बिलिंग प्रति घंटे के हिसाब से होती है।

यदि Claude Cowork जैसा टूल सॉफ्टवेयर को खुद डेवलप और मेंटेन करने लगेगा, तो भारतीय कंपनियों के ‘सर्विस मॉडल’ की जरुरत कम हो जाएगी।

यही कारण है कि मेंटेनेंस पर निर्भर भारतीय कंपनियों के शेयरों में घबराहट के साथ बिकवाली देखी जा रही है।

Santosh SETH

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