तृणमूल कांग्रेस (TMC) में टूट और बागी गुट द्वारा ममता बनर्जी को पद से हटाए जाने को दर्शाता प्रतीकात्मक चित्र

TMC में बड़ी बगावत: बागी गुट ने ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाया

पश्चिम बंगाल की राजनीति में भूचाल: बागी गुट ने ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से ‘हटाया’, तीन फाड़ हुई TMC”

कोलकाता: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

पश्चिम बंगाल की राजनीति और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) में एक अभूतपूर्व सत्ता संघर्ष शुरू हो गया है।

बागी विधायक और नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी के गुट ने खुद को ‘असली टीएमसी’ घोषित करते हुए एक बड़ा धमाका किया है।

इस बागी गुट ने पार्टी की संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष ममता बनर्जी को उनके पद से हटाने तथा पार्टी के नंबर दो नेता अभिषेक बनर्जी को निलंबित करने का सनसनीखेज ऐलान किया है।

इस बगावत के बाद टीएमसी अब स्पष्ट रूप से टूट की कगार पर पहुंच गई है और पार्टी पर वर्चस्व की लड़ाई चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जाने वाली है।

बागी गुट की बैठक और नई नियुक्तियां (Key Changes)

सोमवार को न्यू टाउन स्थित एक होटल में ऋतब्रत गुट ने विशेष सत्र बुलाया। दावा किया गया कि इस बैठक में 60 विधायक और कोलकाता नगर निगम के 70 पार्षद मौजूद थे।

पद

नव-नियुक्त नेता का नाम (बागी गुट द्वारा)

पार्टी अध्यक्ष

अरूप रॉय (हावड़ा मध्य से विधायक)

पार्टी उपाध्यक्ष

अरूप बिस्वास, फिरहाद हकीम, रथिन घोष और सबीना यास्मीन

 

बगावत का कारण: ‘पार्टी में संवैधानिक संकट’

ममता गुट द्वारा कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में हाल ही में निष्कासित किए गए ऋतब्रत बनर्जी ने इस बगावत को सही ठहराया है।

उनका दावा है कि टीएमसी के संविधान के अनुसार हर 3 साल में राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन होना अनिवार्य है, लेकिन फरवरी 2022 के बाद संगठन का पुनर्गठन नहीं हुआ।

इस ‘संवैधानिक संकट’ का हवाला देते हुए बागी गुट ने नया अध्यक्ष चुन लिया है और चुनाव आयोग को सूचित करने की बात कही है।

तीन हिस्सों में बंटी तृणमूल कांग्रेस

इस ताजा और बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद टीएमसी तीन अलग-अलग गुटों में बंटती नजर आ रही है:

  • पहला गुट: ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली ‘मूल टीएमसी’।

  • दूसरा गुट: ऋतब्रत बनर्जी का ‘असली टीएमसी’ गुट, जो विधानसभा में विपक्षी दल होने का दावा कर रहा है।

  • तीसरा गुट: करीब दो दर्जन लोकसभा सांसदों का धड़ा, जिन्होंने कथित तौर पर ‘नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ में विलय कर लिया है और संसद में एनडीए सरकार को समर्थन दे रहे हैं।

चुनाव चिह्न, 1100 करोड़ का फंड और फ्रीज हुए बैंक खाते

पार्टी पर कब्जे की यह लड़ाई अब कानूनी और आर्थिक मोर्चे पर लड़ी जा रही है:

  • चुनाव चिह्न और फंड: बागी सांसद पार्टी के आधिकारिक चुनाव चिह्न और लगभग 1,100 करोड़ रुपये के पार्टी फंड पर दावा ठोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करने की तैयारी में हैं।

  • बैंक खाते फ्रीज: इस बीच, टीएमसी के तीन मुख्य बैंक खातों को फ्रीज कर दिया गया है, जिनमें करीब 440 करोड़ रुपये जमा हैं। इसके खिलाफ पार्टी ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

  • कोषाध्यक्ष विवाद: 5 जून को खराब चुनाव प्रदर्शन के बाद टीएमसी ने पूर्व सांसद सुभाशीष चक्रवर्ती को नया कोषाध्यक्ष बनाया था। लेकिन, पद से हटाए गए पूर्व कोषाध्यक्ष अरूप बिस्वास ने बैंक को पत्र लिखकर खुद को वैध कोषाध्यक्ष बताया और विवाद का हवाला देकर खातों पर रोक लगवा दी।

अरूप बिस्वास के पत्र के बाद खाते फ्रीज

टीएमसी के कई बैंक खाते कोलकाता स्थित एक निजी बैंक की सेंट्रल प्लाजा शाखा में हैं। अरूप बिस्वास के पत्र के बाद इन खातों में लेन-देन अस्थायी रूप से रोक दिया गया, जिससे पार्टी के भीतर विवाद और बढ़ गया।

इसके बाद पार्टी नेतृत्व ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भी जारी किया। अपने तीन पन्नों के जवाब में अरूप बिस्वास ने पार्टी के वित्तीय लेन-देन पर कई सवाल उठाए।

उनका आरोप है कि वह केवल हिसाब-किताब संभालते थे, जबकि कई वित्तीय फैसले और लेन-देन उनकी जानकारी के बिना किए जाते थे।

इस बीच, टीएमसी से बगावत कर चुके विधायकों के नेता और विधानसभा में विपक्ष के नेता रिताब्रत बनर्जी ने भी अरूप बिस्वास का समर्थन किया।

उन्होंने कहा कि इन खातों में मौजूद धन की जांच होनी चाहिए और यह पता लगाया जाना चाहिए कि कहीं इसमें अवैध रूप से जुटाई गई रकम तो शामिल नहीं है।

19 जून को करीब 10 बागी टीएमसी विधायकों ने बिधाननगर साउथ थाने से इन बैंक खातों को तत्काल फ्रीज करने की मांग की थी। इसके बाद पुलिस ने जांच शुरू की और तीन खातों को फ्रीज कर दिया।

बंगाल की राजनीति अब एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है, जहां आने वाले दिन तय करेंगे कि असली टीएमसी किसकी है।